Skc-mcm/1A/11. 00 The House met at eleven of the clock, mr. Chairman in the Chair mr. Chairman

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SHRI MANI SHANKAR AIYAR (CONTD.): In this regard, there are some figures which I would like to place before you. In the year 1992-93, which I take as the first significant year of reforms, our total Central budgetary outlay on social sector and anti-poverty programmes was of the order of Rs.7,600 crore. In the Budget that was presented by the hon. Finance Minister for the year 2013-14, that sum has been increased to nearly Rs.2,00,000 crore. The increase in the budgetary outlays by the Centre alone has grown by a factor of 25. I am sure the Leader of the Opposition, with the vast research back-up that he has, will not be able to find any other country in the world -- developed or developing, socialist inclined or capitalist inclined -- that has increased its budgetary outlay in this amount on the social sector and anti-poverty programmes. It is 25 times. It is now up to Rs.2,00,000 crore. And on the other side, the subsidies, which are also designed to help the poor, have reached about Rs.2,00,000 crore. But on the Human Development Index, we are continuing to stagnate at about the same position that we were in 1992-93. It is not due to lack of financial resources; it is due to the administrative system. And because economists tend to be caught up in their little bubbles, we have an argument between the Nobel Prize winner Dr. Amartya Sen -- in whose very first batch of students I had the honour to find myself -- and Professor Jagdish Bhagwati on whether you want growth or you want distribution to be more equitable. And the argument either ends at saying that equity is absolutely necessary or at saying that growth is the necessary precondition for equity. It doesn’t translate into the administrative sphere which I think only the IAS officers or former IAS officers like my friend N.K. Singh would be able to properly understand that whatever money you get in your kitty, to get it to reach millions upon millions of people you need millions upon millions of agents. And these millions of agents are available not in the IAS, not in the PCS, but they are available by election by the people through the Panchayat Raj Institutions and the Nagar Palikas. There are 3.2 million elected representatives of the people in our institutions of local self government. Of these, as many as 1.2 million are women. There is a proportion of the SC and the ST in these institutions which is not only equal to their share of the total population but oriented towards the share of their population in each of these institutions of local self government. If we were to utilise them then maybe even as our GDP growth rates have zoomed from what used to be called, rather insultingly, the hindu rate of growth, to, begging Ravi Shankar Prasadji’s pardon, the secret of growth now. We have zoomed up. We are at number two in the world. And we are at number two whether we are booming or whether we are busting. We are at number two. But on Human Development Index, we are at 135. So, if we start thinking along with how to keep our growth rates going and perhaps to accelerate them as to how we should administratively deal with the question of reaching the benefits of growth to the people and moving away from a singular dimension of poverty, which is what happens with an arbitrarily drawn consumption line, that you were referring to and where I must say I share many of your apprehensions to a more multi-faceted approach, then you realise, if you look at the Eleventh Schedule to the Constitution that the 29 subjects mentioned in the Eleventh Schedule constitute the 29 dimensions of poverty in this country. And that the purpose of the Eleventh Schedule is to operationalise the elected institutions of Local Self Government in order to take over the responsibility for distributing the Finance Minister’s largesse to the people of India.

(Contd. by VKK/2M)


SHRI MANI SHANKAR AIYAR (CONTD.): So, if you had concentrated your attack on the inadequate ways in which Panchayati Raj has been going forward, I would have replied to you that the chariot of progress, as conceived in 1992, was expected to run on two wheels – one, the wheel of economic reforms and the other, the wheel of governance reforms. In the last 20 years, because the wheel of economic reforms has run fairly smoothly, we have succeeded in becoming the second fastest growing economy in the world. But, because the wheel of inclusive governance has been wobbling, and in many cases in danger of falling off, those benefits of being the second fastest growing economy in the world have not adequately got translated at the ground level. Usually, the plea at the end of a speech is to the Finance Minister, but in this unusual case, my plea is to the Deputy Leader of Opposition because if I put in a motion, then you people will stop it from coming up; but if you put in a motion, then it is bound to come up. मैं हाथ जोड़कर, विनम्रता के साथ आपसे अनुरोध करता हूँ कि इस पंचायत राज के विषय पर चर्चा करवाने के लिए आप कृपया इंतजाम कीजिएगा। तब आपको भी आश्चर्य होगा कि किस हद तक मैं आपकी प्रशंसा भी करूँगा और किस हद तक मैं आपका साथ दूँगा। आपने अपना भाषण जिन गरीबों की बात बताते हुए, उनका जिक्र करते हुए खत्म किया, वैसे ही आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर मैं आपसे कहता हूँ कि हम भी आपके पक्ष में हैं। हम भी यही चाहते हैं जैसा कि आपने कहा कि एक लोकतंत्र में जनहित को ही हमें मद्देनजर रखना चाहिए और ऐसा देश, जिसमें हमारी 70 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूख से गरीब है, उनके बारे में हम जरा सोचें, लेकिन उनके बारे में सोचने के बजाय इस ग्रोथ रेट को ही पकड़ कर इतना लम्बा भाषण देना -- आप अपने को ही मौके दीजिए, मेरे भाई नरेश अग्रवाल जी को भी एक मौका दीजिए और मुझको भी मौका दीजिए कि हम आम जनता और आम आदमी के बारे में बात करें और यह न सोचें कि पूँजीपति खुश है, तो जनता खुश है। चलिए, ग्रोथ रेट हमारे वित्त मंत्री अपने आप आगे बढ़ाएँगे, लेकिन यहाँ उन लोगों की जरूरत है जो स्वास्थ्य के बारे में सोच रहे हैं, जो शिक्षा के बारे में सोच रहे हैं, जो सामाजिक कल्याण के बारे में सोच रहे हैं, जो हमारी जनजातियों के बारे में सोच रहे हैं और जो हमारे बहुत ही दबे हुए तबकों के बारे में सोच रहे हैं। (समय की घंटी)

MR. DEPUTY CHAIRMAN: Please conclude.

SHRI MANI SHANKAR AIYAR: I am about to finish, Sir. इन सबको मद्देनजर रखते हुए, उनके विकास के लिए हमें कौन से ठोस कदम उठाने हैं, उस पर हम चर्चा करवाएँ। वह चर्चा एक रचनात्मक तरीके से करवाने के लिए जो रिपोर्ट हमने तैयार की है, वह मौजूद है, उसी रिपोर्ट पर सरकार कुछ बहुत ही आवश्यक कदम उठा रही है, उससे हम आपको अवगत कराएँ और आपके जो सुझाव हैं, वे भी हम सुनें। इस तरीके से आप भी यह कहकर चुनाव की तरफ जाएँ कि हमने मणि शंकर का साथ दिया, मैं भी यह कहकर जाऊँ कि मैंने रवि शंकर का साथ दिया और रवि शंकर-मणि शंकर का जोड़ हो जाए तब देश का बड़ा कल्याण होगा। शुक्रिया।


श्री रवि शंकर प्रसाद: महोदय, मैं चर्चा के लिए तैयार हूँ, लेकिन संसदीय कार्य मंत्री कहाँ हैं? मणि शंकर जी ने मुझसे कम, संसदीय कार्य मंत्री से अधिक आग्रह किया है कि उनकी पार्टी उनकी चिन्ता नहीं कर रही है। वे उस पर बहस के लिए कोशिश करें, हम भी तैयार हैं।

प्रो. एस.पी. सिंह बघेल (उत्तर प्रदेश): उपसभापति महोदय, मैं आपका आभार प्रकट करना चाहूँगा कि बहुत समसामयिक विषय पर यह परिचर्चा हो रही है और उसमें मेरी पार्टी की लीडर और आपने मुझे भाग लेने का अवसर प्रदान किया।

(उपसभाध्यक्ष (श्री भुवनेश्वर कालिता) पीठासीन हुए)

मैंने अर्थशास्त्र से संबंधित तमाम विद्वान वक्ताओं के वक्तव्य सुने। आज इस विषय पर चर्चा का मतलब ही है कि हमने कहीं न कहीं यह स्वीकार कर लिया है कि आधुनिक भारत की अर्थव्यवस्था पटरी से नीचे है।

(2एन/एमसीएम पर जारी)


प्रो0 एस0पी0 सिंह बघेल (क्रमागत) : मैं चाहता हूं कि विभिन्न राजनीतिक दलों के सब लोग मिल करके अर्थव्यवस्था की रेल को पटरी पर लाएं। मणि शंकर जी ने रवि शंकर जी से समर्थन मांगा और हम आपके मांगे बिना ही पूरा समर्थन देने को तैयार हैं कि देश की अर्थव्यवस्था को अगर पटरी पर ले आएंगे तो सबसे ज्यादा फायदा और लाभान्वित इस देश का गरीब होगा। इस देश के प्रधान मंत्री केवल देश के ही नहीं, विश्व के प्रमुख अर्थशास्त्रियों में हैं। जब वित्त मंत्री के रूप में उनको सेवा करने का अवसर मिला तो उन्होंने इसे किसी हद तक सिद्ध भी किया है। प्रधान मंत्री जी प्रमुख अर्थशास्त्री हैं और वित्त मंत्री जी को भी विभिन्न सरकारों में वित्त मंत्रालय चलाने के लिए पर्याप्त समय मिल चुका है। इतना समय काफी होता है कि हम अर्थव्यवस्था को ठीक कर सकें। डिप्टी चेयरमैन साहब, रुपए का जो अवमूल्यन हो रहा है और रुपए की जब वेल्यू कम होती है तो समाज में गरीब की भी वेल्यू कम होती है। कुछ लोगों को आश्चर्य होगा कि 1947 में हम बराबर पर थे। 1947 में रुपया और डॉलर दोनों एक जगह पर खड़े हुए थे। आजादी के बाद 64-65 सालों तक सरकार में कांग्रेस को पूरा अवसर प्राप्त हुआ, जनता पार्टी और तीसरे मोर्चे ने भी सरकार चलाई, हमारे एन0डी00 ने भी सरकार चलाई। लेकिन इन 64-65 सालों में रुपए की वेल्यू डॉलर की तुलना में सभी सरकारों में कम हुई है। मैं बहुत आंकड़ों वाले भाषण में विश्वास नहीं करता हूं, फिर भी 1947 में रुपया और डॉलर बराबर था, 1952 में डॉलर की तुलना में रुपए की वेल्यू 4.75 रही। 1966 में 7.50, 1975 में 10.40, 1990 में 18.11, 1991 में 25.79, 1998 में 42.58, 2000 में 46.88, 2002 में 48.23, 2006 में 44.49, 2010 में 45.09, 2011 में 51.10, 2012 में 54.47 और 2013 में 60.21, यह रुपए की वेल्यू है। मैंने 1977 से 1980 के बीच का भी जिक्र किया, 1947 से लेकर 1977 तक की भी रुपए की वेल्यू बताई है। एन0डी00 की सरकार जो 1998 से लेकर 2002 तक रही थी, उस समय भी डॉलर की तुलना में रुपए की क्या वेल्यू थी, यह भी बताई है। हमें सोचना यह होगा कि अगर डॉलर मजबूत होगा तो कुछ लोग लाभान्वित हो सकते हैं। इस देश में कुछ लोगों का काम डॉलर से चलता होगा, रूबल से चलता होगा, यूरो से चलता होगा, पौंड से चलता होगा, फ्रेंक से चलता होगा। लेकिन देश की बड़ी आबादी जो गरीबों की है, पिछड़ों की है, दबे हुए लोगों की है, कुचले, पीड़ित, शोषित और एस0सी0, एस0टी0, ओबी0सी0, माइनॉरटी की है, ये सब रुपए पर निर्भर हैं और जब रुपए की वेल्यू कम होती है तो गरीब की परेशानी बढ़ती है। 66 साल में 6000 प्रतिशत रुपया लुढ़का है। 1990 से लेकर आज तक 200 फीसदी से ज्यादा हमारे रुपए में गिरावट आई है। सब लोगों को मिलकर रुपए का मूल्य बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। जो महंगाई है उसकी सबसे ज्यादा मार देश के गरीबों पर पड़ रही है। पहले आम आदमी अपनी बोलचाल में कह देता था कि कभी भी चले आओ, दाल रोटी की कोई कमी नहीं है। गरीबों पर क्या आज यह जुमला चरितार्थ होता है कि चले आओ, दाल रोटी की कमी नहीं है? लेकिन आज दाल की मात्रा कम हो गई है और दाल में पानी की मात्रा बढ़ गई है। बड़े स्वाभिमानी, खुद्दार और ईमानदार लोग अक्सर एक बात कह दिया करते थे कि अरे, प्याज के साथ रोटी खा लेंगे, कांदा के साथ रोटी खा लेंगे, प्याज पर एक मुक्का मारेंगे, नमक ले लेंगे और रोटी के ऊपर रख करके अपना गुजारा करेंगे। जब बाजार में प्याज 80 रुपए किलो हो तो खाली प्याज के साथ रोटी खाना भी पूरे गरीब परिवार के लिए सम्भव नहीं है।

(2o/hms पर जारी)

प्रो0 एस0पी0 सिंह बघेल (क्रमागत) : महोदय, योजना आयोग ने कहा है कि आज गांव में 27 रुपए कमाने वाला व्यक्ति गरीबी की परिभाषा में नहीं आता और शहर में 33 रुपए कमाने वाले व्यक्ति को गरीब नहीं कहा जाएगा। महोदय, मैं केवल प्याज, रोटी की बात करना चाहूंगा और दूसरे व्यंजनों की बात नहीं करना चाहूंगा। आज 27 रुपए में ढाई सौ ग्राम प्याज आएगा। महोदय, मैं केवल प्याज की बात कर रहा हूं। इस तरह कहकर योजना आयोग ने गरीबों का मजाक उड़ाया है। हमें गरीबी दूर करने की कोशिश करनी चाहिए न कि गरीबों को दूर करने की और अगर योजना आयोग उनकी गरीबी दूर न कर पाए, तो उसे गरीबों का मजाक उड़ाने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। मैं आप से यह प्रश्न पूछना चाहूंगा कि जब 80 रुपए किलो प्याज हो, तो क्या 27 रुपए की इनकम वाले व्यक्ति को हम गरीबी से ऊपर मानेंगे?

महोदय, जब मुद्रा स्फीति की दर ऊंची होती है, तो उसका दबाव रुपए पर पड़ता है। मैं अर्थशास्त्री का विद्यार्थी नहीं हूं, फिर भी कहीं--कहीं मुद्रा स्फीति के बढ़ने का प्रभाव यह हुआ है कि आज बाजार से एक नया पैसा गायब है, दो का सिक्का गायब है। महोदय, हम छोटे थे तो तीन नए पैसे भी मिलते थे। आज दस का, बीस का और हमारी प्यारी चवन्नी गायब है। पहले मुहावरों में चवन्नी का प्रयोग होता था। आज की नई पीढ़ी को पता नहीं होगा कि पहले टका हुआ करता था और कौड़ियों से व्यापार होता था, फिर पैसा आया, आने आए। अब एक आने में क्या होगा? पहले 16 आने तो बहुत बड़ी बात थी। महोदय, आज सवाल यह है कि जब हम बाजार से सामान लेने जाते हैं, तो अगर 5 रुपए दुकानदार को लौटाने होते हैं, तो वह टॉफी लौटाता है क्योंकि आज हमारे यहां से सिक्के गायब हो रहे हैं।

महोदय, देश की आर्थिक व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए हमारी पार्टी पूरी तरह तैयार है। माननीय मंत्री जी, आप ट्रेडिंग के लिए ज्यादा-से-ज्यादा विकल्प उपलब्ध कराइए। मैं समझता हूं कि आज ट्रेडिंग के कुछ घंटे और बढ़ने चाहिए और ये घंटे तभी बढ़ेंगे जब कानून व्यवस्था ठीक होगी। तब बाजार देर रात तक खुल सकते हैं। सरकार को, गैर-जरूरी लग्जरी की वस्तुओं के आयात पर शुल्क बढ़ाना चाहिए। मैं “गैर-जरूरी” शब्दों पर जोर देना चाहूंगा। आज की स्थिति में महंगाई के मुख्य कारण, एक तरफ आयात में कमी होना और दूसरी तरफ कच्चे तेल के आयात में धुंआधार बढ़त हैं। इन दोनों चीजों ने मिलकर चालू खाते के घाटे को लगभग बेकाबू हालात में ला दिया है। मेरी समझ में बढ़ी हुई मुद्रा स्फीति और गिरती हुई ग्रोथ रेट का अनुपात बढ़ जाने पर महंगाई की मार भी बढ़ जाती है। अब जब सरकार एफडीआई पॉलिसी लायी है और हम लोगों ने इस मामले में आपको समर्थन भी दिया है, तो उसे इसे और उदार बनाना चाहिए। खास तौर से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को विदेशी बाजारों से धन जुटाने के लिए सरकार को प्रोत्साहित करना चाहिए। महंगाई रोकने के लिए हमें आर्थिक कामकाज में बेहतर वित्तीय प्रबंधन की आवश्यकता है और खर्च की कार्य-कुशलता भी बढ़ानी जरूरी है। ये उन मामलों में और जरूरी हैं जो सब्सिडी से संबंधित मामले हैं।

महोदय, मैं कहना चाहूंगा कि कारोबार के मामले में देश में अच्छा वातावरण पैदा किया जाए। हम बात-बात में चाइना का उदाहरण देते हैं, तो उसकी दिशा में कुछ कोशिश भी की जानी चाहिए। सरकार को व्यापार के मामले में सभी स्तर पर कारोबार की सहूलियत के लिए उसमें लगी बाधाओं को दूर करना चाहिए। महोदय, चाइना में जब कोई व्यापारी एक वस्तु पैदा करना चाहता है और उसके लिए संबंधित कार्यालय में जाता है, तो वहां का पूरा कार्यालय इस बात में लग जाता है कि इसे पर्यावरण विभाग की, इंडस्ट्री विभाग की एनओसी दिलायी जाए। उसे जमीन उपलब्ध करायी जाए।

(2 पी/केएलजी पर जारी)


प्रो. एस. पी. सिंह बघेल (क्रमागत): वहां वन विंडो सिस्टम है और पूरा विभाग इस पक्ष में हो जाता है कि कैसे उसको ज्यादा से ज्यादा सहूलियत दिलाएं, लेकिन हमारे यहां इससे उल्टा है। हमारे यहां सारे लोग पीछे पड़ जाते हैं कि इस इंडस्ट्री को, फैक्टरी को, कंपनी को चलने नहीं देंगे और उसका उत्पादन आसानी से होने नहीं देंगे। मेरा आपसे निवेदन होगा कि जिसको हम इंस्पेक्टर राज कहते हैं, उस इंस्पेक्टर राज को कहीं न कहीं कम करने कोशिश की जानी चाहिए और महंगाई या बेरोजगारी के लिए बात-बात पर बढ़ती जनसंख्या का बहाना नहीं बनाना चाहिए। चीन की तरह हमें भी बढ़ती हुई जनसंख्या को असेट्स में कन्वर्ट करना चाहिए। बढ़ती हुई जनसंख्या को बहुत ज्यादा लायबिलिटी समझ कर हम बहाना बनाएं, यह कोई अच्छी बात नहीं है।

महोदय, एक बात मैं विशेष तौर पर कहना चाहूंगा कि किसानों को उनकी उपज का जब तक लाभकारी मूल्य नहीं मिलेगा, तब तक देश खुशहाल नहीं हो सकता, क्योंकि शहर के बिना गांव तो खुशहाल हो सकते हैं, लेकिन गांव के बिना शहर कभी खुशहाल नहीं हो सकते। जिस साल किसान को उसकी उपज का लाभकारी मूल्य मिलता है, उस साल वह बाजार में जाता है, सामान खरीदता है और उसी साल वह कोशिश करता है कि वह अपनी लड़की की शादी करे, उसी साल वह सोना-चांदी खरीदता है, उसी साल वह ईंट, सीमेंट, सरिया खरीद कर मकान बनाने की कोशिश करता है। जिस साल किसान की उपज कम होती है और उसे लाभकारी मूल्य नहीं मिलता है, तो उसके कस्बे के व्यापारी को भी कहीं न कहीं प्रभावित होना पड़ता है। प्याज आज बहुत महंगा है, लेकिन नासिक का प्याज वाला किसान उधर परेशान है कि उसको कीमत नहीं मिल रही। जाड़ों में गरीब आदमी रजाई खरीद नहीं पाता है, तो महाराष्ट्र और गुजरात का कपास का किसान परेशान होता है। आम आदमी अपने बच्चों को संतरा खिला नहीं पाता, तो नागपुर का संतरे वाला किसान बहुत परेशान होता है। अगर कहीं गरीब मरीज सेब नहीं खा पा रहा है तो कश्मीर का सेब उत्पादक किसान परेशान है। आज किसान जो पैदा करता है वह सबसे घाटे में है और जो आखिरी व्यक्ति शहर में, कस्बे में, गांव में, ठेले से कालोनियों में खरीदता है वह उपभोक्ता भी परेशान है। मेरे कहने का मतलब यह है कि जो बीच का मामला है, आप इसको दूर कीजिए। अलाउद्दीन खिलजी की जो बाजार व्यवस्था थी, मैं समझता हूँ कि वह किसी मामले में ठीक थी। किसान को उसकी उपज का लाभकारी मूल्य मिलना चाहिए। आज जरूरत इस बात की है कि सरकार उपभोक्ता वस्तुओं, टेलीकॉम, पावर प्लांट एवम् अन्य परियोजना वस्तुओं, खासतौर से चीन के मामले में, वहां से आयातित वस्तुओं पर पाबंदी लगाए, सोने-चांदी के आयात पर प्रभावी नियंत्रण लगाए, विदेशी संस्थागत निवेशकों के निवेश पर तीन साल के लॉकइन पीरिएड का प्रावधान लागू किया जाए और विदेशी कंपनी द्वारा अनधिकृत रूप से हो रहे विदेशी मुद्रा अंतरण पर प्रभावी रोक लगाने का काम किया जाए। दूरदर्शी सरकार वह होती है, जब उसे पता चलता है कि महंगाई की संभावना है, तो उसके लिए वह कुछ प्रबंध करती है। संवेदनशील सरकार वह होती है, जो पहले से ही गरीबों की परेशानी को समझ कर उसे दूर करने के लिए कुछ न कुछ इलाज करती है।

महोदय, मैं दो मिनट में अपनी बात खत्म करुंगा। आज रुपए की दयनीय हालत को देखकर विदेशी निवेशक अपना पैसा निकाल रहे हैं। रुपया कहां तक गिरेगा और शेयर बाजार कहां तक लुढ़केगा, यह कहना अभी कठिन है, लेकिन रुपए की कीमत गिरने और डॉलर के मजबूत होने से अर्थव्यवस्था को जो जोरदार झटका लग रहा है, उससे आम आदमी की स्थिति बहुत खराब होने जा रही है। यह सर्वविदित है कि हम अपनी जरूरत का 70 से 80 परसेंट तेल विदेशों से आयात कर रहे हैं, जिसकी हम डॉलर में कीमत अदा करते हैं। जब डॉलर में हम कीमत अदा करेंगे, तो पैट्रोलियम प्रोडक्ट्स हमें महंगे मिलेंगे और जब पैट्रोलियम प्रोडक्ट्स, खासतौर से पैट्रोल और डीजल महंगे होते हैं तो समाज के हर वर्ग को उसकी महंगाई की मार झेलनी पड़ती है। ट्रेक्टर वाले को, ट्रक वाले को, कार वाले को, स्कूटर वाले को महंगाई का सामना करना पड़ता है। जब यातायात के साधन महंगे हो जाते हैं तो जीवन की रोजमर्रा वस्तुएं, चाहे वह सब्जी हो, फल हो, गेहूं हो, सारी चीजें महंगी मिलती हैं, जिससे महंगाई की सबसे ज्यादा मार गरीब आदमी को झेलनी पड़ती है।

उपसभाध्यक्ष (श्री भु वनेश्वर कालिता): आप खत्म कीजिए, आपका टाइम समाप्त हो गया है।

प्रो. एस. पी. सिंह बघेल: सर, डीजल के भाव बढ़ने से जब सभी चीजों की कीमत बढ़ती है तो अर्थशास्त्र की भाषा में यह स्पाइरल इफेक्ट कहलाता है और स्पाइरल इफेक्ट की वजह से हर तबके के लोगों को महंगाई का सामना करना पड़ता है। अर्थशास्त्र का एक नियम है कि जब महंगाई हद से ज्यादा बढ़ जाती है, तब उपभोक्ता अपनी जरूरत की चीजें कम खरीदता है। इसको हम मंदी कहते हैं। इससे एक तरफ महंगाई रहती है और दूसरी तरफ मंदी, इस स्थिति को अर्थशास्त्र में स्टेगफ्लेशन कहते हैं।

(2क्यू/एमपी-एनबीआर पर जारी)


प्रो. एस.पी. सिंह बघेल (क्रमागत) : इस स्टैग्फ्लेशन से देश गुज़र रहा है, यह बात तो आपको स्वीकार करनी पडे़गी। महोदय, भारत में तेज़ी से विदेशी मुद्रा का भंडार कम हो रहा है, इसके कई कारण हैं। निर्यात में वृद्धि नहीं हो रही है, सोने के आयात को हम कम कर रहे हैं। ...(व्यवधान)...

उपसभाध्यक्ष (श्री भुवनेश्वर कालिता) : बघेल जी, समाप्त कीजिए।

प्रो. एस.पी. सिंह बघेल : उपसभाध्यक्ष महोदय, कोयले का भंडार होने के बावजूद भी हम कोयले का आयात कर रहे हैं, यह भी महंगाई का एक कारण है। इसलिए हम चाहते हैं कि हम कोयले का उत्पादन ज्यादा से ज्यादा कर सकें, गैस के रिसोर्सेज ढूंढ सकें, गैस जहां-तहां उपलब्ध हो सके, हम उसमें आत्मनिर्भर हों, जिससे कि समतामूलक समाज स्थापित हो सके और समाज में समरसता स्थापित हो सके। जब तक सरकार आखिरी व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान नहीं लाएगी, तब तक समतामूलक समाज नहीं बनेगा। आखिरी व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान तभी आएगी, जब महंगाई कम होगी, रुपए की वैल्यू बढ़ेगी और देश का आम नागरिक महंगाई की मार से अपने आपको बचा पाएगा। तो यह खड़ी लाइन नहीं होनी चाहिए, पड़ी लाइन होनी चाहिए। महोदय, जो पैसे वाला है, वह और पैसे वाला होता जा रहा है। ...(व्यवधान)...

उपसभाध्यक्ष (श्री भुवनेश्वर कालिता) : अब आप समाप्त कीजिए। ...(व्यवधान)...

प्रो. एस.पी.सिंह बघेल : गरीब और गरीब होता जा रहा है, इसलिए मैं इन चन्द सुझावों के साथ माननीय वित्त मंत्री महोदय से यह अनुरोध करना चाहूंगा कि कुछ ऐसे प्रयास किए जाएं कि रुपए की वैल्यू बढ़े और महंगाई कम हो, जिससे आखिरी व्यक्ति के चेहरे पर आप मुस्कान ला सकें और देश में समतामूलक समाज के साथ-साथ सामाजिक समरसता को स्थापित कर सकें, जो इस देश के पूर्वजों का सपना था। बहुत-बहुत धन्यवाद।


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