Skc-mcm/1A/11. 00 The House met at eleven of the clock, mr. Chairman in the Chair mr. Chairman



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SHRI BHAGAT SINGH KOSHYARI: They don’t allow me. ...(Interruptions)... I am speaking and they are shouting! ...(Interruptions)...

(Contd. by 1E/KSK)

pb/mp -- KSK/SC/11.20/1E



SHRI BHAGAT SINGH KOSHYARI (CONTD.): They don’t allow me. Are they anarchists or not? You tell me. I am speaking here. ...(Interruptions)...

श्री सभापति : आप बोलिए..(व्यवधान)..कोश्यारी जी, आप बोलिए..(व्यवधान)..

SHRI BHAGAT SINGH KOSHYARI: Are they anarchists? You tell me and I will sit down. ...(Interruptions)... संसद के अंदर हम सब लोग बैठे हैं, उनमें भी कमी होगी, हममें भी कमी होगी। अगर हम लोग कुछ बोलते हैं तो वह इसलिए बोलते हैं क्योंकि यहां ऐसे बहुत से मैटर्स आते हैं। मैं जानता हूं कि मैं कभी नहीं चिल्लाता हूं। हम बहुत से मौकों पर खड़े भी नहीं होते हैं, लेकिन बहुत से मैटर्स ऐसे आते हैं जो संसद से ऊपर, सारे देश को टच करते हैं, उन मैटर्स का संबंध देश से होता है। उस समय यदि ट्रैज़री बेंचेज़ से सही उत्तर नहीं आता है, रेसपाँसिबल रिप्लाई नहीं आता है तो हमें कहीं न कहीं बोलना पड़ता है, ज़ोर से भी बोलना पड़ता है। यह बात ठीक है कि वैल में नहीं जाना चाहिए। मैं भी इस बात को मानता हूं कि यह बहुत अच्छी प्रैक्टिस नहीं है, लेकिन जो ट्रैज़री बेंचेज़ हैं, जो रेसपाँसिबल व्यक्ति हैं, अगर वे सही ढंग से उत्तर नहीं देंगे तो क्या उसके लिए ये सब रेसपाँसिबल हैं? इसलिए मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि आप बहुत अनुभवी व्यक्ति हैं, आप तो डिप्लोमैट हैं, आप इसको डिप्लोमैटिकली भी बोल सकते थे। मेरा आपसे यह निवेदन है कि इस तरह से अच्छा मैसेज नहीं जाएगा। मैं आपसे निवेदन कर रहा हूं कि it will not send a good message to the country and worldwide.

MR. CHAIRMAN: Now, Shri Rapolu, one last Member.

SHRI ANANDA BHASKAR RAPOLU (ANDHRA PRADESH): Respected Chairman, Sir, let me mention a few words. I am a newcomer, just almost one-and-a-half years old. Discipline being in the interest of contemporary Indian Parliamentary history, yesterday, your anguish was for the self-introspection and you have decisively and precisely used the word ‘if’. With that only, you have mentioned this. You and your Chair have Indian historic respect and you shall not expunge the word which you have mentioned. We need not worry about that and we, the Parliamentarians, have to rise up to your expectations and to the expectations of Indian history and of the future. Thank you, Sir.

(Ends)


SHRI DEREK O’BRIEN (WEST BENGAL): Sir, I have a simple clarification to seek from you. I am a comparatively new Member. I have been here only for two years and all other senior Members have spoken. In all humility, I would seek a clarification. Sir, by making a statement and then putting an interrogation mark at the end of it all, does that make that statement any different by putting a full stop at the end of the statement? I just want you to clarify this for me so that I can learn while I am here because otherwise, I could say anything and then make the interrogation mark the reason for not making it part of the proceeding. Sir, will you please clarify that for me?

(Ends)


MR. CHAIRMAN: Mr. O’Brien, I think you and I both learnt some of the English language in the same institution. An interrogatory statement is an interrogatory statement. It is not a prescription; it is not ascribing. It is only interrogatory. That’s all. Anyway, let’s get on with our...(Interruptions)... प्रकाश जावडेकर जी, आप बोलिए।..(व्यवधान)..

श्री प्रकाश जावडेकर (महाराष्ट्र) : सर, मैं केवल दो मिनट लूंगा। मुझे बहुत दुख होता है, जब भी सदन में कोई ऐसा सीन होता है जिससे काम में बाधा आती है, लेकिन डेमोक्रेसी एक सीरियस प्रोसेस है और लोकतंत्र एक तरफा मामला नहीं होता है, रेसपाँसिव गवर्नमेंट होना बहुत जरूरी होता है। ..(व्यवधान).. Extraordinary situations sometimes give vent in an extraordinary manner also. But, let me tell you, Sir, you please withdraw...(Interruptions)... One minute, this is my last sentence. Sir, you withdraw it in the best interest of democracy and dignity of your Chair also because otherwise, people will say that you are presiding over that ‘federation’. So, that should not happen. That is serious.

MR. CHAIRMAN: That is ascriptive.

SHRI PRAKASH JAVADEKAR: No. So, this should not happen and that is why, I request humbly that you withdraw it. (Ends)

(Followed by 1F/GSP)



GS-GSP/1F/11.25

डा. एम.एस. गिल (पंजाब): सर, जिस कुर्सी पर आप बैठे हैं, उसके नीचे गद्दी नहीं है, मेरी समझ में। मैं भी बड़े सालों से देख रहा हूं कि आपकी कुर्सी के नीचे गद्दी नहीं है।

MR. CHAIRMAN: Silence, please. ..(Interruptions)..

डा. एम.एस. गिल : वे साधु जो कीलों के ऊपर लेटते हैं, आपके नीचे तो कीलें हैं। मैं बड़े सालों से देख रहा हूं, मुझे आप पर तरस भी आता है, माफ करना । “तरस” भी आता है, यही शब्द मेरे दिमाग में आया है। आप कभी-कभी दुख ही प्रकट करते हैं। मुझे उर्दू का शेर याद नहीं है, पर आपको याद होगा। मैं कह सकता हूं कि आप चोट भी मारते हैं और आप हमें रोने भी नहीं देते हैं। देखिए, यह सवाल टेक्निकेलिटी का नहीं है कि लफ्ज का अर्थ, or, what is the precise meaning, or, how you can twist it around to explain it in your way, and, I don’t think, we necessarily need only Marxist explanation in this. सवाल तो यह है कि सबको अपने अंदर भी देखना चाहिए, आल पार्टीज़ को अपने अंदर देखना चाहिए। जो पासवान जी ने कहा, मेरी उनसे हमदर्दी है, उन्होंने एक लाइन में कह दिया कि अंदर भी देखना चाहिए। पंजाब में कहते हैं कि अपनी पीढ़ी के नीचे भी सोटा फेरो I जिस पीढ़ी के ऊपर बैठे हो, उसके नीचे भी सोटा फेरो। आपको दिखेगा कि आप या मैं या ये क्या कर रहे हैं? सवाल तो यह है, if you are very touchy about your honour, you should be; you should also be touchy about the honour of this House collectively, and, the Vice President represents that honour in his single self. So, it is not a question of saying, please take this back, and, then, we feel happy or not. I leave it to him; I leave it to you, but I don’t have too much sympathy for this. I think, this occasion has arisen accidentally and it has arisen to make everybody rethink inside, are we going to function like this? I have sat in the House of Elders, and, fortunately, I am an elder now, in term, here also and otherwise also; I can’t hide it. क्या करूं?

So, Sir, it is for all of us to think. It is not just a simple question that because we all feel you should do this, you roll it back. What effect it will have on you and the running of this House tomorrow, I leave it to you to judge. (Ends)



MR. CHAIRMAN: Thank you. Do you really wish to speak?

श्रीमती रजनी पाटिल (महाराष्ट्र): सर, इस सदन में सब बोल रहे थे कि एक-डेढ़ साल हुआ है, एक-डेढ़ साल हुआ है, लेकिन मेरा सबसे छोटा कार्यकाल सात महीने का रहा है, इसलिए मैं इस सदन की प्रि-मैच्योर बेबी हूं, ऐसा बोल सकती हूं। मैं यह बोलना चाहती हूं कि आपने जो शब्द उस दिन यूज़ किया, उसका शब्दार्थ यहां पर सब विद्वान लोग कर रहे हैं। लेकिन शब्दार्थ करने के बजाय, जो जनता की भावना है, उससे मैं आपके माध्यम से सदन को अवगत कराना चाहती हूं। जब हम बाहर जाते हैं या जब हम अपनी कांस्टीट्युएंसी में जाते हैं, तो लोग बोलते हैं कि हम टैक्स भरते हैं और आप राज्य सभा में जाकर एक दिन भी कामकाज नहीं होने देते हैं। यह जो उद्वेलिता लोगों के बीच में है, उसे मैं आपके माध्यम से सदन को बताना चाहती हूं क्योंकि इसको हम सब जानते हैं। सब लोग हमारी तरफ उंगलियां उठाकर कह रहे हैं कि आप राज्य सभा में जाकर करते क्या हो, हर दिन तो राज्य सभा बंद होती है, आप काम नहीं करते हो, लोगों में यह भावना है। सर, ...(व्यवधान)...

डा. वी. मैत्रेयन : लोग टू जी, कोलगेट के बारे में भी बोलते हैं।...(व्यवधान)...

श्रीमती रजनी पाटिल : सर, हमने हर बार ...(व्यवधान)...

श्री सभापति : आप लोग बैठ जाइए। ...(व्यवधान)... Please sit down. Let the speaker speak. ..(Interruptions)..

श्रीमती रजनी पाटिल : सर, हमारे यहां क्वेश्चन ऑवर का एक भी दिन आज तक नहीं हुआ है। सर, हम हर दिन अपनी तैयारी करके आते हैं और यहां पर हम सोचते हैं कि जब क्वेश्चन ऑवर चलेगा, तो हम देश के सवाल करेंगे, जनता के सवाल करेंगे, लेकिन वे सवाल तो होते नहीं हैं। हमें यह लगता है कि आपने जो भावना व्यक्त की वह उद्वेलितता से व्यक्त की और इस भावना से हम सब सहमत हैं। क्योंकि हमें ऐसा लगता है कि जनता का जो पैसा है, वह इस तरह से बेकार नहीं जाना चाहिए। सदन में काम होना चाहिए।

(समाप्त)



MR. CHAIRMAN: Thank you. ..(Interruptions).. Now, Venkaiahji, ..(Interruptions).. Of course, Venkaiahji. ..(Interruptions)..

श्री साबिर अली: सर, हमें भी बोलने का मौका मिलना चाहिए। ...(व्यवधान)...

श्री सभापति : आप बैठ जाइए। ...(व्यवधान)...

श्री साबिर अली : सर, हमें इतना हाथ उठाना पड़ता है, फिर भी हमें बोलने का मौका नहीं मिलता है। ...(व्यवधान)... आप हमें भी बोलने का मौका दीजिएगा। ...(व्यवधान)...

श्री सभापति : आपकी भी बारी आती है, आप ऐसा मत कहिए। ...(व्यवधान)... आप बैठ जाइए। ...(व्यवधान)...

(ASC/1जी पर आगे)



-GSP/YSR-ASC/11.30/1G

SHRI M. VENKAIAH NAIDU (KARNATAKA): Sir, we all come to this House to raise the voice of the people. ...(Interruptions)...

MR. CHAIRMAN: Silence please.

SHRI M. VENKAIAH NAIDU: Be it corruption, be it price rise, be it farmers’ problem, be it suicides by farmers, be it atrocities on women, be it scams and scandals taking place across the country day in and day out...(Interruptions)... When we are not allowed to raise those issues and the Government wants to stifle the voice of the opposition, at times, extreme steps are taken of protesting ...(Interruptions)... And they give pravachan to us. Nobody will be happy to go to the Well of the House. Nobody will be happy to shout from their seats. But it is happening. The entire country has been watching this Parliament for years together. I have been in the Parliament for the last 13 years. In the recent past, what had happened in the House; how many times the Ruling Party Members went to the Well of the House snatching papers from the hands of Ministers and got the House adjourned forcefully? The question is this. We have to take a uniform stand. There should be a holistic approach. We have to think seriously about the functioning of the House. It should not be selective. It should not be aimed at one section or the other section. My appeal to the Chair is, first the Government, which is having the power, should allow the space of the opposition for the opposition parties to raise the voice of the people. And that is not being allowed. ...(Interruptions)... That is not being allowed. ...(Interruptions)...

MR. CHAIRMAN: Let the hon. Member conclude. ...(Interruptions)... No. ...(Interruptions)... Let the hon. Member conclude. ...(Interruptions)... Venkaiahji, please finish. ...(Interruptions)... बैठ जाइए, बैठ जाइए। ....(व्यवधान).. One minute. ...(Interruptions)... Please conclude. ...(Interruptions)... Please conclude.

SHRI M. VENKAIAH NAIDU: And if the people want to have both, the power and to stifle the opposition, it cannot be allowed. As told by the Leader of the Opposition the other day, Sir, Parliament is not simply a debating House or a shouting House; it is a forum to demand accountability from the Government. That is what we are trying to do. My appeal to the Chair is, please have a uniform approach. Let us not be selective in our approach towards this side or that side. This comment by the Chair is a reflection on the functioning of the House. The House includes all. ...(Interruptions)... The House includes all. That is what I am saying.

MR. CHAIRMAN: So, it does not refer to any one section of the House. Thank you. ...(Interruptions)...

SHRI M. VENKAIAH NAIDU: I am coming to that. Sir, I said this because I wanted this response to come from the Chair. I am happy that you have given that response. It is very odd for me to argue with the Chairman whom I personally respect.

MR. CHAIRMAN: And so do I.

SHRI M. VENKAIAH NAIDU: I respect you because I know who the Chairman of the Rajya Sabha is. It is not just the post but the person also. My agony is this. I stood up even after the Leader of the Opposition had spoken. Sir, you said that it’s not selective at all. I am happy about it. All these things, which I narrated, have been happening for so many days. People were not named. Only the other day, 20 of my colleagues have been named. If it is not selective, what else is it? And then when we raised this issue, we were assured that it would be taken care of and it would be removed from the record. So far, nothing has happened. The Ruling Party Members, who are giving pravachan to us, should remember what they did when they were in the opposition. ...(Interruptions)... I am not trying to justify ...(Interruptions)... Sir, I request the Chair ...(Interruptions)... please ...(Interruptions)... let us try to forget this. I appeal to the Chair to see that the word, in whatever sense it was used, whether as a question mark or as a suggestion or whatever it is, it is better that it is withdrawn, so that there is happy ending to it and we all work together.

(Ends)


MR. CHAIRMAN: Shri Sabir Ali. ...(Interruptions)... Absolutely the last. ...(Interruptions)...

श्री साबिर अली (बिहार) : शुक्रिया सर। सर, मैं अपने जज्बात को इस तरह रखना चाहता हूं कि कल सदन में चेयर की तरफ से जिस शब्द का,जिस अल्फाज़ का इस्तेमाल किया गया, मेरी व्यक्तिगत और personal ओपिनियन यह है कि इस सदन के लिए यह ठीक था। मेरा एक साल से लगातार यह तीसरा सेशन है और मुझे अपोजिशन के साथ बैठने का मौका मिला या जो मेन अपोजिशन था, उसके साथ बैठने का मौका मिला। उस वक्त भी सदन के अंदर और सदन के बाहर मैंने अपनी व्यक्तिगत राय रखी थी कि सदन चलना चाहिए।

(1H/LP पर जारी)

-ASC/LP-VKK/11.35/1h



श्री साबिर अली (क्रमागत) : एक दिन में क्वेश्चन ऑवर में बोलने का मौका इस सदन में बैठे हुए सदस्यों में से मुश्किल से पाँच लोगों को मिलता है। उसकी तैयारी तीन महीने से की जाती है और गवर्नमेंट से उसका आन्सर आता है। कभी-कभी आन्सर में लैकुना जरूर रहता है, मैं गलत शब्द का इस्तेमाल नहीं करूंगा, लेकिन वे लोग, जिनको एक लंबे अर्से की उम्र बिताने के बाद इस सदन में आने का मौका मिलता है और अपनी बातों को सरकार से पूछने का मौका मिलता है, जिस पर लगातार 3 महीने पहले से मेहनत की जाती है और कुछ लोग जब चाहे इस सदन को एडज़र्न करवा देते हैं..(व्यवधान)..

श्री सभापति : खत्म कीजिए।

श्री साबिर अली : सभापति जी, दो मिनट, बहुत लोगों ने बहुत देर तक बोला है, हमको भी बोलने का मौका मिलना चाहिए, मैं आपसे बड़े आज़ादान अंदाज़ में गुज़ारिश करना चाहता हूं कि तीन महीने मेहनत करने के बाद एक क्वेश्चन, दो क्वेश्चन से ज्यादा किसी को स्टार्ड क्वेश्चन में प्रश्न पूछने का मौका नहीं मिलता है। जिसका चौथे नम्बर के बाद सीरियल नम्बर आता है, उसको तो वैसे ही बोलने का और अपने सवालों को पूछने का मौका नहीं मिलता है। इसलिए मैं इस बात का पुरज़ोर हिमायती हूं कि कम से कम क्वेश्चन ऑवर को किसी भी कीमत पर रोकना नहीं चाहिए। चाहे अपोजिशन में कोई भी पार्टी रहे, यदि वह अपनी बात को रखना चाहती है, तो छह से सात घंटे तक सदन चलाया जाता है, उस बीच अपनी बात रखी जा सकती है। कुछ लोग जब चाहे व्यवधान पैदा करते हैं। मेरा क्वेश्चन लगातार तीन बार आया, यह बहुत सेंसिटिव क्वेश्चन था, मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था, लेकिन मुझे पूछने का मौका नहीं मिला। इसलिए मैं अपने दिल की गहराइयों से उस बात का बिल्कुल खंडन नहीं करना चाहता हूं। मैं इसका सपोर्टर हूं कि इसमें अनॉर्की, मोनार्की शब्द चलते हैं और इसलिए इस तरह से व्यवहार नहीं होना चाहिए। मैं आपको धन्यवाद देता हूं।

MR. CHAIRMAN: Thank you. सत्यव्रत जी। इनके बाद और कोई नहीं है। ..(व्यवधान)..

श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी (मध्य प्रदेश) : सभापति जी, बहुत बेहतर तो यह होता कि आज हम जिस मसले पर बहस कर रहे हैं, यह बहस होती ही नहीं । लेकिन बहस हुई है, तो शायद इससे कुछ अच्छा निकल आए। समुद्र मंथन से ज़हर भी निकला था और अमृत भी, इसलिए कोशिश यह है कि इससे शायद अमृत निकल आए। आपत्ति इस बात पर है कि लोग मानते हैं कि आपने जो लफ्ज़ इस्तेमाल किया, उससे हमारे सदन की और हमारे मैम्बर्स की प्रतिष्ठा कम होगी। मैं नहीं जानता कि यह वास्तव में पार्लियामेंट्री है या नहीं है, एक्चुअली यह बहस का मुद्दा भी नहीं है, लेकिन मैं यह मानता हूं कि जिन्हें आपत्ति है, उनको और हम सब को, इस सदन की और अपनी गरिमा व प्रतिष्ठा का चिंतन करने का पूरा अधिकार है। हम चेयरमैन की शब्दावली में सुधार करने के लिए तो इतने उत्सुक हैं, बहुत अच्छी बात है, सुधार कर लीजिए, लेकिन हम रोज़ाना यहाँ पर जो व्यवहार करते हैं, क्या उससे हमारी गरिमा और प्रतिष्ठा इस देश में और लोगों में बढ़ती है? क्या उस व्यवहार और आचरण के कारण हमारी गरिमा और प्रतिष्ठा पर आँच नहीं आती है? एक मिनट के लिए हम यह सोच लें, संशोधन कर लें, सुधार कर लें, तो क्या चेयरमैन साहब, इतने से हमारी गरिमा और प्रतिष्ठा स्थापित हो जाएगी? अगर हमारा व्यवहार वही रहे, जो हम करते आए हैं, तो हमारी प्रतिष्ठा स्थापित नहीं होगी। बहुत अच्छा है कि चेयरमैन साहब ने तो जो सोचा, वो सोचा, लेकिन आज के इस मौके पर जो सुधार होना हो, वह एकतरफ़ा न हो, वह दोनों तरफ़ हो। वह सुधार वहाँ भी हो और यहाँ भी हो। हम पहले यह तय कर लें कि हमारा आचरण इस सदन के अंदर ऐसा नहीं होगा कि जब कभी ऐसी शब्दावली उपयोग करने का यदि अवसर भी आए, तो हम नहीं करेंगे। यदि आज हमारा यह निर्णय हो गया, अगर आज हम अपने इस आचरण में संशोधन और सुधार करने के लिए तैयार हैं, तो मैं समझता हूं कि यह बहस बहुत सार्थक हो गई और आपका जो कथन है, वह कथन बहुत सार्थक हो गया। मुझे इतना ही कहना है कि बेहतर है कि इस बहस का इस्तेमाल दोनों तरफ के सुधार के लिए हो जाए।

(समाप्त)



MR. CHAIRMAN: Thank you very much. I would take a couple of minutes. I wish the Rajya Sabha were to have such interesting debates more frequently. I have got the sense of the sentiments of different sections of the House. I want to make 2-3 things clear. Firstly, the Chair is not a part of the Government, not as the Chair. In another capacity, in the State’s structure, yes. But, that is a very important thing. The Chair is a referee in a hockey match or a football match. (Contd. by KR/1j)

KR-AKG/1J/11.40

MR. CHAIRMAN (CONTD.): The Chair has been given a Rule Book, a yellow card and a red card; and he or she is expected to allow the game to be played as per the rules. If a game is allowed to play as per the rules, no yellow card is required, forget about the red card altogether.

Now that is what this Chair has endeavoured to do. But then it does happen that you try aspiring for treating an ailment which turns out to be more endemic, more persistent and recurring. I think my personal view is, and I would like to make this submission to all sections of the House, particularly to the party leaders that the time has come for us to review our practices, our rules and carry out such changes as are necessary because the rules are made by the House; and the House is fully competent to amend the rules and modify the rules. Therefore, I would like to convene, as early as possible, a meeting of the leaders so that we could have a frank and practical discussion about how the rules need to be amended, if they need to be amended. I have the sense of the House, I will ask the Secretariat to review the remarks in the light of the record that they have. We will proceed from there.

Can I now beg your indulgence to have the Question Hour?

(Ends)


Q.No.121

श्रीमती कुसुम राय : सर, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से यह पूछना चाहती हूँ कि सीएजी ने अप्रैल में अपनी रिपोर्ट में साफ कहा था कि उत्तराखंड में आपदा प्रबन्ध की कोई व्यवस्था मौजूद नहीं है, फिर भी सीएजी की चेतावनी के बाद भी आपदा प्रबन्ध के लिए केन्द्र सरकार द्वारा कोई कदम क्यों नहीं उठाया गया और हजारों लोगों को असमय मौत के घाट उतरने के लिए मजबूर कर दिया गया? वहाँ पर ऐसी त्रासदी आई है कि पूरा देश हिल गया है। उत्तराखंड में इस तरह का माहौल हुआ है, लेकिन फिर भी वहाँ पर कोई व्यवस्था नहीं हो पाई है। मैं आपके माध्यम से मंत्री से यह पूछना चाहती हूँ कि क्या उन्होंने कोई ऐसा ठोस कदम उठाया है कि आगे ऐसा कुछ न हो?


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