SK/1A/11. 00 The House met at eleven of the clock, mr. Chairman in the Chair. OBITUARY REFERENCE mr. Chairman



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Date26.10.2016
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(महाराष्ट) : आदरणीय उपसभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से माननीय वित्त मंत्री जी को वर्ष 2013-14 का बजट पेश करने के लिए बधाई देता हूं । यह बजट जो सरकार द्वारा पेश किया गयाए यह पालिसी स्टेटमेंट और देश के डवलपमेंट के प्रति उनके विजन को दर्शाता है । आने वाले वर्ष और समय में देश की आर्थिक सेहत कैसी रहेगी, यह भी देश का वित्तीय बजट दर्शाता है । जब भारत के फाइनेंस मिनिस्टर बजट पेश करते हैं तब न सिर्फ देश के बल्कि सारी दुनिया के इनवेस्टर्ज़ और डिसिज़न मेकर्स की उस पर गहरी नज़र होती है और देश की पाज़िटिव या निगेटिव तस्वीर पेश करने में यह एक सब से महत्वपूर्ण टूल की तरह यूज़ किया जाता है ।

सर, मैं वित्त मंत्री जी को उन्होंने जो बजट में आंकड़े पेश किये हैं, उसकी चर्चा में उलझना नहीं चाहूंगा लेकिन कुछ विषयों पर अपनी बात रखना चाहूंगा । साढ़े पांच लाख करोड़ का बजट पेश किया गया, उसमें एस.सी., एस.टी. और ट्राइब्ल्ज़ के लिए 63000 करोड़, महिलाओं के कार्यक्रमों के लिए 97000 करोड़ बच्चों के कार्यक्रमों के लिए 77000 करोड़ दिये गये तथा टोटल बजेटरी आऊटले का 16.5 प्रतिशत यानी 27300 करोड़ एजुकेशन के लिए प्रस्तावित है । इनफ्रास्ट्रक्चर डवलपमेंट के लिए तकरीबन 80000 करोड़ प्रस्तावित है । यह सारा फाइनेंशियल आऊटले सराहनीय है लेकिन इसे वास्तव में उसी समय सराहा जाएगा जब आने वाले समय में यह पूरे तरीके से खर्च होगा और रिवाइज्ड बजट में फिगर्ज़ को कम नहीं किया जाएगा । फार एग्ज़ेम्पल पिछले साल देश को इरीगेशन प्रोजेक्ट के लिए 14000 करोड़ रुपये भारत सरकार ने देने का प्लान किया था लेकिन प्राप्त जानकारी के अनुसार केवल साढ़े तीन हजार करोड़ के आसपास ही दिए गए । इसलिए मेरा सम्माननीय वित्त मंत्री जी से आग्रह है कि The money proposed to be spent on a particular head should not look only lucrative, but it should also turn into real expenditure और हम सब की पैनी नज़र इसे हमेशा देखती रहेगी । इस पूरे बजट में सम्माननीय वित्त मंत्री जी ने world economic crisis का हवाला दिया और कहा कि इससे विपरीत हमारे देश की आर्थिक स्थिति इस मुकाबले में बेहतर है । मैं मानता हूं कि दुनिया की आर्थिक स्थिति चिंताजनक है लेकिन मैं आपके माघ्यम से सीधा प्रश्न करना चाहता हूं कि पिछले 10 वर्षों में लगातार बिगड़ती हुई भारत की आर्थिक स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है ? मेरा दृढ़ विश्वास है कि फाइनेंशियल प्लानिंग देश की नब्ज़ होती है और इसे हमेशा पार्टी पालिटिक्स से ऊपर उठ कर देखना चाहिये । सरकार भी सभी से उम्मीद करती है कि वह नीति निर्धारण में जो देश हित में हो, उसका साथ दे । यह अपेक्षा गलत नहीं है लेकिन सरकार को भी सारे आंकड़ों व तथ्यों को पेश करते समय ईमानदारी का निर्वाह करना होगा । आज देश में इरीगेशन, पावर, आयल, डीज़ल और कोयले की डिमांड और प्राइसिंग की स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि लगे हुए उद्योग बंद हो रहे हैं । नये इनवेस्टमेंट आ नहीं रहे हैं । परिणामस्वरूप देश का उद्योग जगत भारी संकट से गुजर रहा है । Telecommunication, Power, Coal, Steel इनसे जुड़ी इंडस्ट्रीज़ की हालत यह है कि देश के बैंकों में देश के उद्योगों को दिया हुआ तकरीबन 10 लाख करोड़ का लोन कैसे वापस आएगा । इस पर प्रश्न चिन्ह लग गया है । प्राप्त जानकारी के अनुसार बैंकों के पास तकरीबन 30000 करोड़ के CDR के प्रोपोज़ल हर क्वार्टर में आ रहे हैं । This is highly alarming.

Sir, इन सब का impact मंहगाई पर इतना पड़ा है कि आम आदमी की कमर टूट गई है । माननीय अटल बिहारी बाजपेयी की एन.डी.. सरकार के समय इस देश में खाना,पीना, रहना और शिक्षा प्राप्त करना हर आम आदमी के बस में था और आज इन basic needs की पूर्ति भी एक भीषण समस्या बन गयी है । Food inflation पिछले कई वर्षों से लगातार 10 प्रतिशत है । आयल और डीज़ल के रेट सरकार अब महीनों में नहीं बल्कि हफ्तों में बढ़ाने लगी है । हमारा देश आज policy paralysis से ग्रसित है । पालिसी सिर्फ पेपर पर है उसका स्पीडी और टाइमली इंपलीमेंटेशन एक गंभीर समस्या बन चुकी है । ये सिर्फ हम नहीं कह रहे हैं देश के बड़े उद्योगपतियों ने स्वयं सम्माननीय प्रधानमंत्री जी को पत्र लिख कर अपनी पीड़ा व्यक्त की है ।

हम भारत को कृषि प्रधान देश कहते हैं और आज कृषि के क्षेत्र में अनेक संकट हैं । किसान को बिजली, पानी, खाद नहीं मिल रहा है । वह कर्ज के बोझ से परेशान है । Food items की कीमतें आसमान को छू रही हैं । लेकिन किसान को उचित मूल्य नहीं मिल रहा है । किसान आत्महत्या कर रहा है। मेरी सरकार से अपील है कि दृढ़तापूर्वक स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को तुरंत लागू कर देना चाहिये ।

मैं वित्त मंत्री जी से अपील करता हूं कि जितना आऊटले उन्होंने जिस सेक्टर के लिए प्रोपोज़ किया है, वह एचीव हो, इसके लिए सभी सहयोगी मंत्रालयों का जरूरी सहयोग ले कर देश में चिंतित औरद्योगिक वातावरण को दूर कर के आम आदमी महंगाई की समस्या को समझकर इन आंकड़ों को real expenditure में परिवर्तित करे अन्यथा यह बजट सिर्फ एक दिखावा रह जाएगा ।

अंत में सुप्रसिद्ध जैन संत परम पूजनीय आचार्य महाप्रज्ञाजी की बात दोहराना चाहूंगा "विश्वास प्राप्त करना और विश्वास दिलाना, यही मनुष्य जीवन का सार है" । आदरणीय वित्त मंत्री जी, मैं यही आपको याद दिलाना चाहूंगा । धन्यवाद ।

(समाप्त)



श्री रघुनन्दन शर्मा (MADHYA PRADESH) :

माननीय सभापति जी, मैं वर्ष 13-14 के भारतीय बजट पर बोलने के लिये खड़ा हूँ। मैंने वित्तमंत्री जी के भाषण को ध्यान से सुना है उन्होंने अपने भाषण के अन्त में स्वामी विवेकानन्द को एवं तमील के महान कवि संत तिरूवल्लुवर को स्मरण किया है। यदि मैं भाषण के प्रारंभ में इन महानुभावों के बोध वाक्य को स्मरण करके चलते तो इन्हें बजट में भारतीय दूृष्टि मिलती। इस बार हमेशा की तरह वित्त मंत्री जी व चाणक्य याद रहे नहीं गांधी व शेक्सपीयर महोदय व्यक्ति के अनुसार मार्गदर्शक भी बदलते रहते हैं। मैंने पिछली बजट बहस में भाग लेते हुए कहा था कि भारत की सामाजिक व्यवस्था इतनी प्रायोगिक है कि पश्चिम के तूफान का प्रभाव हिमालय से टकराकर वापस लौट जाता है।
महोदय ! विश्वव्यापी मंदी की आंधी भारत की संयुक्त परिवार व्यवस्था तथा बचत की घरेलू प्रवृत्ति से टकराकर लौट गई। यह मंदी भारत की अर्थव्यवस्था को हिला नहीं पाई। किन्तु आपने विदेशी प्रेरणा से प्रभावित होकर हमारी संयुक्त परिवार व्यवस्था पर प्रहार किया, मर्मान्तक चोट से इसे तोड़ने का प्रयत्न किया। गैस कनेक्शन में एक परिवार के लिये सीमित सीलेन्डर देने की घोषणा ने संयुक्त परिवार की व्यवस्था को हिला कर रख दिया। 30-30, 40-40 व्यक्तियों के परिवार को तोड़कर अपने परिवार में चार-चार चूल्हे चौके बनाने पड़े, अलग-अलग रसोईघर तैयार करने पड़े एवं छोटे-छोटे राशन कार्ड बनाकर परिवार को विभाजित रूप में दिखाना पड़ा। आप सिलेन्डर की संख्या परिवार की संख्या इसमें साथ एक रसोई में भोजन करने वालों की संख्या से जोड़े। अपनी मानसिकता को भारतीय बनाने का प्रयत्न करे तो ही देश की अर्थ-व्यवस्था मजबूत रह सकेगी।
माननीय सभापति जी, वित्त मंत्री के एक बचकाने वक्तव्य की ओर ध्यान दिलाना चाहूँगा। उनके भाषण के बिन्दू 168 में यात्रियों को उत्पीड़न से मुक्त करने, शिकायत दूर करने की बात कही है। पुरूष को 50 हजार तथा स्त्री को 1 लाख का सोना लाने की अनुमति प्रदान की है। सोने का मूल्य तो घटता बढ़ता है, इसलिये कस्टम एवं कर विभाग का उत्पीड़न तो घटेगा नहीं बढ़ेगा ही, कृपा करके इसे रूपये के बजाय वजन से जोड़िये, व्यावहारिक बनिये अपनी सद्बुद्धि का उपयोग कीजिये।

वित्त मंत्री जी ने भाषण के बिन्दू क्रमांक 186 में जीएसटी कानूनी का पास करने का अनुरोध किया है, मैं कहना चाहूँगा कि केवल अपील से केवल शब्दों से काम नहीं चलेगा। आप कृपा करके इस कानून के पश्चात राज्यों के राजस्व में होनेवाली हानि की क्षतिपूर्ति का ठोस विकल्प दीजिये। दृढ़ संकल्प से युक्त होकर उनकी क्षति को पूरा करने का वजन दीजिये, परिणाम सकारात्मक होगा।


सभापतिजी, वित्त मंत्रीजी, ने यह कहते हुए लज्जा का आभास भी नहीं किया कि 2004 में संप्रग की सुविचारित नीति के कारण भारत की विकास दर 8% थी वह घट कर आज आधी रह गई, आज 4% है किन्तु निर्लज्जता आने पर व्यक्ति अपनी गलती को स्वीकार नहीं करता।
महोदय, बिन्दू क्रमांक 43 में आंकड़ा देते समय चालाकी से इस वर्ष का कृषि ऋण 7 लाख करोड़ किया है। वस्तुत: 5 करोड़ 75 लाख तो पहले से ही था। बढ़ाया केवल एक करोड़ 25 लाख करोड़ ही है। किन्तु दिखाया ऐसा मानों इन्होंने 7 लाख करोड़ रूपये कृषि ऋण बढ़ा दिया है । चालाकी पूरे भाषण में परिलक्षित है । सभी स्थानों पर करोड़ या लाख करोड़ रूपये की बजाय सारे आंकडे प्रतिशत में दर्शा दिये जिससे पिछले बजट का सरलता से तुलनात्मक अध्ययन ही न हो सके ।
सभापति जी :- अब तो बजट का कोई महत्व ही नहीं बचा, चाहे जब यानि वर्ष में कई बार महीने में दो बार ही डीजल पैट्रोल एवं घरेलू गैस का मूल्य बढ़ता दिखाई देगा, यही नहीं अब बजट के पूर्व भी और पश्चात् भी रेल यात्रा की दरें बढ़ती दिखाई देगी । यह गरीबी का उन्मूलन करने वाली नहीं, गरीबों का उन्मूलन करने वाली सरकार है ।
वित्तमंत्री जी ने इस सरकार ने स्वयं माना है कि निर्यात में गिरावट हो रही है तथा आयात में अप्रत्याशित उछाल है । अपने भाषण के पृष्ठ 2 पर बिन्दु क्रमांक 11 में यह स्वीकारोक्ति है बर्बादी की स्वीकारोक्ति है । ये मिटने के लक्षण हैं ।
सभापति जी, एक चिन्ता का विषय है कि चीन के बड़े हथियार निर्माता तथा निर्यातक देशों में आ गये हैं और आज भी हम हथियार आयात करने वाले बड़े देशों में हैं, यहां तक कि इजरायल जैसे छोटे देशों से भी हम हथियार खरीद रहे हैं । क्यों हमने हथियारों के कारखाने स्थापित नहीं किये । लाखों करोड़ों करोड़ रूपये के हथियार रखरीदने वाला धन हथियार फैक्ट्री में लगाते तो हम भी हथियार निर्माता ही नहीं हथियार निर्यातक देश बन जाते ।
महोदय, खाद के दाम छलांग लगा कर बढ़ रहे हैं । कृषि उत्पादन प्रभावित होगा और यदि यह हुआ तो हमारा सकल घरेलू उत्पादन भी घटेगा जो देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करेगा । कृपया खेती का लाभ का व्यवसाय बनाइये । गांवों में रोजगार पैदा कीजिये । मनरेगा तो रचनात्मक एवं विकास कार्य की योजकता को बढ़ाने के बजाय भ्रष्टाचार तथा ग्रामीण युवाओं के निकम्मेपन को बढ़ाने वाली योजना है । इसे विभाजित ग्रामीण विकास के साथ जोड़ा जाना चाहिये ।
घरेलू कम्पनियों पर अधिक करारोपण से कम्पनियाँ हतोत्साहित होगी जिससे विकास दर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा । माननीय महोदय, आज की भीषण बढ़ती मंहगाई को देखते हुए करारोपण की प्रथम स्लेब 3 लाख रूपये से शुरू होनी चाहिये। यदि सरकार सच्चे मन से इस देश के सर्वांगीण विकास की चिन्ता करना चाहती है तो ग्रामीण सड़कों तथा रेलमार्गों को विस्तार देने के लिये युद्ध स्तर पर योजना कार्यान्वित करनी पड़ेगी । माननीय अटल जी के सपनों के भागीरथ प्रयास नदियों को जोड़ कर उसके जल को निरर्थक समुद्र में मिलने से रोकना होगा । उसे उर्वरा भूमि में प्रवाहित करना होगा । यदि ये कुछ कार्य कर डाले तो काले धन को ले आये, भ्रष्टाचार पर रोक लगा लें तथा लालफीताशाही की अंग्रेज परस्त नीति को ध्वस्त कर दिया । विदेशी निवेश को हमारे अधोसंरचना में अव्यावसायिक विदेशी निवेश को रोका तो भारत विश्व की महाशक्ति बन सकेगी । सरकार अपनी देश निष्ठा का परिचय देकर भारतीयता के अनुरूप विचार करते हुए आय-व्यय का अनुमान करे तो देश के देशवासियों का हित होगा ।

धन्यवाद । ( Ends)


श्री वीर सिंह (UTTAR PRADESH) :

उपसभापति महोदय, वर्ष 2013-14 के सामान्य बजट के संबंध में आपने मुझे बहुजन समाज पार्टी की तरफ से चर्चा करने का समय दिया उसके लिए मैं आपका व अपनी पार्टी अध्यक्षा आदरणीय बहन कुमारी मायावती जी का धन्यवाद करता हूँ। महोदय आम बजट सरकार की आर्थिक नीतियों तथा आर्थिक आंकड़ों का लेखा-जोखा होता है। साथ-साथ उसमें राजनीतिक एजेंडा विशेष रूप से नीतिगत घोषणाएं भी की जाती हैं, जिससे जनता को पता चलता है कि सरकार उन्हें राहत पहुंचाने के लिए क्या कुछ करने जा रही है। यही नीतिगत फैसले जनता को आकर्षित करते है। माननीय वित्त मंत्री जी जब बजट पेश कर रहे थे तो उस समय देश की जनता बहुत ही आशा के साथ देख रही थी कि संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल के आखिरी पूर्ण बजट में क्या-क्या लोकलुभावन घोषणाएं होने जा रही हैं, परंतु बजट भाषण में माननीय वित्त मंत्री जी ने सभी वर्गों को विशेषकर आम आदमी व अति गरीब लोगों को न केवल निराश किया बल्कि उन्हें महंगाई से निजात दिलाने हेतु कोई कारगर उपाए नहीं किए हैं। अत: सरकार का दावा कि बजट प्रावधान से आम आदमी का कल्याण होगा, सार्थक नहीं होने वाला है। यह आम बजट मंत्री जी की बाजीगिरी का बजट है जिसमें महिला, युवा और गरीब को केन्द्र में रखकर सभी को साधने की विवशता और अर्थव्यवस्था को उबारने की मजबूती ने कमोवेश सभी को निराश किया है। बजट 2013-14 के लिए 16 लाख 65 हजार 297 करोड़ रुपये के कुल व्यय तथा 5 लाख 55 हजार 322 करोड़ रुपये के योजना व्यय का अनुमान है जो कि पिछले वित्तीय वर्ष के बजट की तुलना में करीब 24 प्रतिशत अधिक है। लेकिन महंगाई जिस अनुपात में बढ़ी है उसके अनुरूप यह बजट नाकाफी है। बजट में राजकोषीय घाटा, सकल घरेलू उत्पाद का 5.3 प्रतिशत जो कि लगभग 5 लाख 20 हजार 9 सौ 25 करोड़ रुपये होता है, दिखाया गया है। वित्त मंत्री जी ने इसे अगले साल तक 4.8 प्रतिशत तक कम करने का भरोसा जताया है और इसके लिए कदम उठाने की बात कही है तथा प्रमुख रूप से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ाने का रास्ता बताया है परंतु यह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश मात्र एक छलावा ही साबित होगा क्योंकि वर्तमान में सरकार के पास लगभग 7 लाख करोड़ के निवेश का मामला लंबित है वही, कोयला घोटाले के कारण ऊर्जा क्षेत्र की प्रगति पर भी प्रश्नचिन्ह लग गये हैं। अत: माननीय मंत्री जी राजकोषीय घाटा कम कैसे करेंगे यह मैं जानना चाहूंगा।

महोदय, आर्थिक सर्वेक्षण में आर्थिक मोर्चे पर जो उम्मीद जताई गई थी, बजट में ऐसा कुछ विशेष दिखाई नहीं देता है जो महंगाई और बेरोजगारी जैसी गंभीर समस्याओं का समाधान कर सके। मान्यवर, आज आम आदमी महंगाई की मार से मर रहा है। खाने-पीने की वस्तुओं में महंगाई आसमान छू रही है। बजट बाद भी महंगाई पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। वित्त मंत्री जी ने महंगाई पर लगाम लगाने हेतु कुछ नहीं किया है। वह खाने-पीने की चीजों समेत रोज-मर्रा की जरूरत की वस्तुओं पर कर आदि में कमी कर जनता को संदेश दे सकते थे कि संप्रग सरकार महंगाई कम करने के लिए कटिबद्ध है। लोग महंगाई से राहत चाहते है परंतु इससे निजात नहीं मिल रही है। उल्टे सरकार ईंधन उत्पादों को डिकंट्रोल कर, और ऊँची कीमतों, करों व सेवा प्रभारों को और बढ़ाने जा रही है। पेट्रोलियम और उर्वरक कीमतों को बढ़ाने का रोडमैप पहले ही लागू हो चुका है। डीजल के मूल्यों में बेहताशा वृद्धि हुई है। इसी दौरान जमीनी हकीकत की उपेक्षा करते हुए सरकार ने गैस सिलेंडरों की सीमा बांध दी है जिसके परिणामस्वरूप काफी भ्रम पैदा हो गया है और कालाबाजारी ने गैस सिलेंडरों की कीमतें बढ़ा दी हैं। सभी प्रकार के परिवहन लागत तुरंत बढ़ जाने के साथ-साथ इसका सभी प्रकार की वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि का बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। पेट्रोलियम पदार्थों के लगातार बढ़ रहे मूल्यों को आगे और बढ़ाने का बजट में साफ-साफ संदेश दे रखा है। बजट में पेट्रोलियम सब्सिडी पर 36,980 करोड़ रुपये बचाये गये हैं। इससे यह पता चलता है कि पेट्रोल, डीजल और गैस के मूल्य और बढ़ेंगे। स्वाभाविक है इसका सीधा असर आम आदमी के जीवन से जुड़े उपभोग की सभी वस्तुओं के मूल्यों में भारी वृद्धि होगी। मेरा माननीय मंत्री जी से आग्रह है कि महंगाई व मुद्रास्फीति को रोकने हेतु विशेष कदम उठाए तथा सब्सिडी वाले गैस सिलेंडरों की संख्या नौ से बढ़ाकर बारह करने की घोषणा भी करें। जिससे आम जनता को राहत की सांस मिल सके। माननीय मंत्री जी का दावा है कि इस बजट से महंगाई दर थमने में सहूलियत होगी, जो कि संदेहास्पद है। मैं मंत्री जी से चाहूंगा कि खाद्य उत्पादों की कीमतों में तेजी को रोकने के लिए आपूर्ति पक्ष को बेहतर बनाये तथा राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में करने हेतु ठोस कदम उठाए जिससे महंगाई की दर कम हो सकती है।

महोदय, मंत्री जी ने अपने भाषण में कहा था कि भारत एक बहुल और विविधता वाला देश है और यदि हमने सदियों से वंचित, उपेक्षित और गरीब तबके पर विशेष ध्यान नहीं दिया तो समाज के कई वर्ग पीछे छूट जाएंगेा लेकिन उन्होंने इस उपेक्षित तबके की तरफ जो बजटीय आवंटन विशेष रूप से अनुसूचित जाति उपयोजना और अनुसूचित जनजातीय उपयोजना के आवंटन में मूल रूप से बढ़ाने की बात कही है वह वर्तमान जरूरतों के लिहाज से नाकाफी है क्योंकि देश में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी लगभग 25 प्रतिशत है तथा आवंटन का प्रतिशत भी उनकी सामाजिक, आर्थिक दशा व कुल संख्या के हिसाब से करीब 1,45,000 करोड़ होनी चाहिए। किंतु इस वर्ग विशेष के विकास के लिए बजट में व्यापक व्यवस्था नहीं की गई है जिससे इस देश के बहुत बड़े गरीब तबके को निराशा हाथ लगी है। बजट में यह घोषणा की गई है कि इन उपयोजनाओं में आवंटित धनराशि का प्रयोग किसी अन्य मद या योजना में करना वर्जित है। यह सरकार का एक अच्छा कदम है, स्वागतयोग्य है। इसके इस उपेक्षित तबके को विकास की मुख्यधारा में लाने में कुछ सहायता मिल सकती है तथा आवंटित धनराशि के दुरुपयोग पर अंकुश लगाया जा सकेगा। मैं यह कहना चाहता हूं कि सरकार इन वर्गों के लिए बहुत सारी योजनाएं बनाती है परंतु इन वर्गों के विकास के लिए योजना आयोग से धनराशि समय पर अवमुक्त नहीं होती है। अत: मेरी माननीय मंत्री जी से गुजारिश है कि वे इन वर्गों के विकास के लिए प्रदेशों को स्पेशल कम्पोनेट प्लान के अंतर्गत धनराशि समय पर अवमुक्त करें जिससे एससी/एसटी के लोगों का सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक विकास हो सके। दूसरा, सरकार ने वर्ष 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों में दिल्ली प्रदेश की सरकार ने दलितों के विकास की 744 करोड़ रुपये की धनराशि राष्ट्रमंडल खेलों के विकास में खर्च की थी। जिसका मामला बहुजन समाज पार्टी के सदस्यों द्वारा सदन में अनेकों बार उठाया गया था और माननीय वित्त मंत्री जी जो 2010 में देश के गृह मंत्री होते थे, ने सदन में आश्वासन दिया कि जल्द ही दलितों के विकास का पैसा, दलितों के विकास पर ही खर्च किया जायेगा। तो क्या माननीय मंत्री जी ये बताएंगे कि उक्त 744 करोड़ रुपये दिल्ली के दलितों पर खर्च कर दिया गया या नहीं।



महोदय, भारत कृषि प्रधान देश है। कृषि ही हमारी अर्थव्यवस्था का मूल आधार है।पूरे देश की तरक्की कृषि के ऊपर निभर्र करती है, क्योंकि यदि किसान को उसकी फसल का उचित दाम मिलेगा तो वह खुशहाल रहेगा, देश की तरक्की होगी। जब गांव खुशहाल होगा, तो शहर खुशहाल होगा और गांव और शहर जब खुशहाल होंगे, तभी हमारे देश की तरक्की संभव है, क्योंकि जब किसान के पास अच्छी फसल होती है और उसकी फसल का उचित दाम उसको मिलता है, तो वह मकान बनाता है, अच्छे ढंग से शादी-विवाह करता है। वह मकान बनाएगा, तो सामान खरीदने के लिए शहर में व्यापारी के पास जाएगा और सरिया, सीमेंट खरीदेगा। अगर बच्चों की शादी करेगा, तो शहर में व्यापारी के पास जाकर कपड़े वह सोना-चांदी आदि खरीदेगा। जब किसान खुशहाल होगा, तो व्यापारी भी खुशहाल होगा और जब दोनों खुशहाल होंगे, तो देश की तरक्की होगी, इसिलए मैं माननीय मंत्री जी से निवेदन करूं गा कि कृषि के लिए जो बजट 27,049 करोड़ रुपये दिया गया है, वह पर्याप्त नहीं है। हालांकि माननीय मंत्री जी ने कृषि सुधार के लिए काफी प्रयास किए हैं, जिसके लिए हम उनका शुक्रिया अदा करते है। कृषि अनुसंधान हेतु आपने जो 3,415 करोड़ रुपए का प्रावधान बजट में किया है, वह पर्याप्त नहीं लगता है। वित्त मंत्री जी को इस पर विचार करना चाहिए और शोध कार्यों के लिए आवंटन बढ़ाना चाहिए। कृषि भण्डारण, खाद्य प्रसंस्करण, कृषि विपणन पर भी तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। मेरा मानना है कि रेल बजट की तरह कृषि का भी अलग से बजट तय होना चाहिए क्योंकि देश की उन्नति कृषि के ऊपर काफी हद तक निर्भर करती है।

हमारे 80 प्रतशत से ज्यादा किसान लघु और सीमांत हैं उन्हें बाजार में बहुत मुश्किलें आती हैं। इस संदर्भ में कृषि उत्पादन संगठनों को सहायता प्रदान करना काफी महत्वपूर्ण है परंतु इसके लिए काफी कम संसाधन जुटाए गए हैं। महोदय कृषि वाणिज्यिक होती जा रही है और खर्च बढ़ रहे हैं ऐसे में किसानों को निजी स्रोतों से लोन लेने से बचाने के लिए संस्थागत ऋण को बढ़ाना अनिवार्य है इससे निजी निवेश को भी बढ़ावा मिलेगा। इन सबके बावजूद बजट में ऐसी कई खामियां हैं जिन पर गौर न करने से कृषि क्षेत्र पर तात्कालिक और दूरगामी दुष्प्रभाव पड़ सकता है। जिस प्रकार से हमारे देश के किसान कर्ज के बोझ तले आत्महत्याएं कर रहे हैं विशेषतया महाराष्ट्र में विदर्भ क्षेत्र में तथा देश के अन्य प्रदेशों में भी किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। उससे पता चलता है कि आज भी किसानों की दशा अति शोचनीय है। हमें किसानों व कृषि को लाभकारी बनाने की दिशा में कार्य करने की आवश्यकता है। इस बार बजट में कृषि ऋण का लक्ष्य 7 लाख करोड़ रुपये रखा गया है जो कि प्रशंसनीय है परंतु वितरण लाभार्थी तक पहुंचे यह देखने की आवश्यकता है। नहीं तो, यह आवंटन भी पहली कर्ज माफी योजना की तरह बंदरबांट किया जा सकता है। मान्यवर, केन्द्र सरकार की योजना की सही जानकारी पीड़ित किसान को मालूम नहीं होती है। अत: इसकी पब्लिसिटी बैंकों के माध्यम से किसानों को दी जानी चाहिए। सरकार ऋण माफी योजना में व्याप्त खामियां जैसे वास्तविक लाभार्थी तक पहुंचने हेतु प्रबंधन तंत्र की स्थापना, कर्ज माफी हेतु पात्र किसानों की सूची, कर्ज के लिए पात्रता में छूट व बैंकों को ऋण वितरण हेतु दिशानिर्देश आदि बनाने की आवश्यकता है। मेरे संज्ञान में आया है कि जनवरी, 2013 से अब तक अकेले विदर्भ में लगभग 65 आत्महत्याएं हुई हैं तथा एक बार ऋण माफी के बाद भी किसान ऋण का बोझ तले मर रहा है। यह इसलिए हो रहा क्योंकि किसान को अपनी उपज की सही कीमत नहीं मिल रही है। लागत का खर्चा लगातार बढ़ रहा है। खाद , बीज, दवाएं, बिजली, पानी, डीजल सब महंगे हो रहे है और न्यूनतम समर्थन मूल्य में मामूली बढोतरी हो रही है। लागत और कीमत का फासला कम हो रहाहै, इसलिए किसान को घाटा बढ़ रहा है। कृषि मूल्य आयोग के गेहूं और धान के लागत में समर्थन मूल्यों के आंकड़ों का अगर आकलन करें तो साफ होता है कि किसान कर्ज के बढ़ते बोझ तले दबा जा रहा है। इसलिए किसानों को लागत के आधार पर लाभकारी मूल्य देने की। आवश्यकता है स्वामीनाथन कमीशन ने इसका एक सूत्र दिया है उनके अनुसार लागत खर्च से 50 प्रतिशत ज्यादा समर्थन मूल्य होना चाहिए, तभी किसान को लाभकारी मूल्य मिलेगा। खेती लाभकारी होगी और किसान कर्ज के बोझ तले नहीं दबेगा।

मान्यवर, देश में आवास की बहुत कमी है। बड़े शहरों में यह एक गंभीर समस्या है। हमारे देश में करीब बीस करोड़ लोग आज भी नीले आसमान के तले ही अपनी रात गुजारते हैं। अभी तक सरकार आवास के मुद्दे पर बड़ी सफलता नहीं प्राप्त कर पाई है। इस बजट में भी केवल आवास की लागत 45,000 रुपये से बढ़ाकर 70,000 रुपये कर दी गई है। जिसमें मकान बनाने जैसे विषय पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। इस महंगाई के जमाने में इतने कम पैसे में एक गरीब कैसे अपना मकान बना सकता है। यह सोचने का विषय है। यदि सरकार वास्तव में गरीबों को मकान देना ही चाहती है तो आप उत्तर प्रदेश के मान्यवर, श्री कांशी राम शहरी गरीब आवास योजना में बनाए गए मकानों को जरूर देख लें। हमारी पार्टी की सुप्रीमों आदरणीय बहन कुमारी मायावती जी ने अपनी सरकार में लाखों गरीब लोगों को दो कमरे के पक्के मकान मुफ्त में दिए जिसमें रसोई, स्नानघर, शौचालय आदि हैं जो कि हमारी पार्टी का उत्तर प्रदेश में एक सफल उदाहरण है। मैं सरकार से गुजारिश करूंगा कि वे भी हमारी पार्टी के उत्तर प्रदेश में बनाये गये मकानों के मॉडल को अन्य प्रदेशों में आवास विहीन करोड़ों गरीब लोगों को इसी प्रकार के मकान बनाकर प्रदान कराए।

मान्यवर, माननीय मंत्री जी ने पहला घर खरीदने पर 25 लाख तक के होम लोन पर एक लाख की अतिरिक्त ब्याज बचत से एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस जैसी कंपनियों को लाभ मिलेगा। इससे रियल एस्टेट सेक्टर में भी उछाल आने की उम्मीद हो सकती है परंतु गरीब को घर मुहैया नहीं हो सकता है। आज भी हमारे देश के करोड़ों लोग रेल की पटरी के किनारे, गंदे नाले के किनारे, मलिन बस्तियों और खुले आसमान में झुग्गी-झोपड़ी बनाकर रहते हैं क्योंकि वह महंगे घर नहीं खरीद सकते हैं। केन्द्र की किसी भी सरकार ने इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। मैं माननीय मंत्री जी से निवेदन करूंगा कि इस ओर विशेष ध्यान देकर हमारे देश में ऐसे जो गरीब लोग हैं, जिनका अपना आशियाना नहीं है जो खुले आसमान के नीचे रहते हैं, जो मलिन बस्तियों में रहते हैं, जो गंदे नालों के किनारे रहते हैं, उनको भी मकान मुहैया कराया जाए। कभी-कभी महानगरों में मलिन बस्तियों को उजाड़ा जाता है, भू-माफिया उनकी बस्तियों में आग लगा देते हैं , उनकी कमाई का जो धन होता है, वह भी उसमें जलकर राख हो जाता है। इस तरह की शिकायतें ज्यादातर महानगरों में मिलती है और इनके बारे में आये दिन समाचार-पत्रों में छपता रहता है। मैं माननीय मंत्री जी से निवेदन करूंगा कि पूरे देश में जितनी इस प्रकार की मलिन बस्तियां है, पूरे देश में जितने गरीब लोग रेलवे लाइन की पटरियों के किनारे, गंदे नालों के किनारे झुग्गी-झोपड़ी बनाकर रह रहे हैं जो खुले आसमान के नीचे रह रहे हैं, उनके लिए एक विशेष अभियान चलाकर ऐसे सर्व-समाज के गरीब लोगों को सरकार द्वारा मकान बनाकर देने चाहिए जिससे कि वे अच्छी तरह से जीवन-यापन कर सके और अपने बच्चों को अच्छा वातावरण दे सकें तथा उनके बच्चे भी अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सके।

मान्यवर, देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली ध्वस्त है। राशन का 60-70 प्रतिशत गेहूं व 20-25 प्रतिशत चावल गरीबों तक पहुंचने के बजाय बाजार पहुंच जाता है। गरीबी की रेखा से नीचे वाले लोगों की पहचान भी घपला है। वास्तविक गरीबों के पास बीपीएल कार्ड नहीं है। केन्द्रीय सत्ता गरीबी को परिभाषित भी नहीं कर पाई। अर्जुन सेन गुप्ता समिति से लेकर तेंदुलकर समिति तक ने 80 प्रतिशत लोगों को अभावग्रस्त बताया है। सरकार के पास इनकी पहचान और ईमानदार सूची बनाने वाले प्रबंधन तंत्र का अभाव है।

आज बीपीएल कार्ड एक बहुत बड़ी समस्या है क्योंकि पूरे देश में जो बीपीएल की श्रेणी में लोग आते हैं, उनको बीपीएल का राशन कार्ड प्राप्त नहीं हुआ है। अगर इसका पूरे देश में सर्वे कराया जाए, तो जो इसका पात्र व्यक्ति है, उसको बीपीएल का कार्ड नहीं मिला है, अंत्योदय का कार्ड नहीं मिला है, क्योंकि जब बीपीएल या अंत्योदय के कार्ड बनाए जाते हैं तब सरकारी कमर्चारी सरपंच या प्रधान के पास जाता है। वह सरपंच या प्रधान की बैठक पर सीधे जाता है और उसी सरपंच या प्रधान से सूची ले लेता है कि आपके गांव में कौन-कौन गरीब लोग हैं, जो बीपीएल की श्रेणी में आते हैं या अंत्योदय की श्रेणी में आते है। वह सरपंच उन लोगों के नाम लिखा देता है जिसने उसे वोट दिए हैं और सरपंच बनाया है, चाहे वे इस श्रेणी में आते हैं या नहीं आते हैं, वे इसके लिए पात्र है या नहीं है। आज पूरे देश में ऐसे लाखो-करोड़ों लोग निकलेंगे जो साधन संपन्न हैं, लेकिन जिनके पास बीपीएल या अंत्योदय का कार्ड है। हमारे देश में ऐसे भी करोड़ों लोग है जो बीपीएल या अंत्योदय के कार्ड के लिए पात्र व्यक्ति हैं, जिनको बीपीएल श्रेणी का लाभ मिलना चाहिए, जिनको अंत्योदय कार्ड का लाभ मिलना चाहिए, लेकिन उनको इसका लाभ नहीं मिल रहा है। मैं माननीय मंत्री जी से मांग करूंगा कि वे देश में बीपीएल श्रेणी की सही पहचान करावें और पात्र गरीब व्यक्तियों को केन्द्र से दी जाने वाली खाद्यान्न व अन्य सहायता का पूरा-पूरा लाभ उनको दें। आज भी जो अनाज भंडारण की सुविधा के अभाव में बेकार सड़-गल जाता है उसे भी ऐसे पात्र गरीबों को बांट दिया जाना चाहिए। बजट में खाद्य सुरक्षा के लिए 10 हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है जोकि राजनीतिक दृष्टि से आधार कार्ड, आपका पैसा आपके हाथ योजना की तरह एक सुविचारित योजना है। वास्तविक लाभार्थी को इसका लाभ पहुंचे। इसके लिए सरकार को आवश्यक प्रबंधन तंत्र बनाने पर गौर करने की आवश्यकता है। वर्ना यह योजना भी अन्य योजनाओं की तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जायेगी।

मान्यवर, बजट में सामाजिक सेवाओं मसलन शिक्षा, युवा कल्याण, खेल, स्वास्थ्य, जल आपूर्ति और सफाई इत्यादि पर पिछले साल की तुलना में खर्च में मामूली बढोतरी की गई है। यदि इसको जीडीपी के लिहाज से देखा जाये तो इसमें 2012-13 (संशोधित अनुमान) के 17 प्रतिशत की तुलना में 2013-14 में महज 1.9 (बजटीय अनुमान) प्रतिशत की बढोतरी की गई है। 2013-14 में इन क्षेत्रों में कुल बजटीय खर्च जीडीपी के 7 प्रतिशत के आस-पास है। सामाजिक क्षेत्र में यह खर्च विकसित और कई विकासशील देशों के औसत स्तर की तुलना में काफी कम है। वस्तुत: इन देशों में यह औसत जीडीपी का 14 प्रतिशत है। सामाजिक सुरक्षा स्कीमों के लिहाज से केवल राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आइबीएसवाई) के लिए विशेष प्रावधान किए गएहैं। इसका दायरा बढ़ाते हुए कुछ अन्य श्रेणियों को इसमें शामिल किया गया है। नेशनल सोशल असिस्टेंस प्रोग्राम (एनएसएपी) के लिए बजटीय आवंटन पिछले साल के 8,382 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 9,541 करोड़ रुपये किया गया है। लेकिन इस मामूली बढ़ोतरी से लाभार्थियों का दायरा बढ़ने की गुंजाइश नहीं दिखती।



मान्यवर, गरीबी उन्मूलन के लिए सरकार का रवैया हकदारी का है न कि सशक्तीकरण का। मनरेगा एक ऐसी ही योजना है जिसमें गांवों में रहने वाले गरीबों व बेरोजगारों को 100 दिन का रोजगार की गारंटी दी गई है। महोदय साल में 365 दिन होते हैं परंतु रोजगार के अवसर केवल 100 दिन ही मिलते हैं। ऐसे में गरीब 265 दिन बेकार रहता है। उसका भविष्य अधर में है। इससे यह पता चलता है कि सरकार गरीबों की उन्नति के लिए प्रयासरत नहीं है। वह नहीं चाहती कि देश तरक्की करे औरकोई बेरोजगार या गरीब अपने बच्चों को पालपोष कर बड़ा करे या उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करे। अत: मैं मंत्री जी से मांग करूंगा कि वे 100 दिन के रोजगार को बढ़ाकर कम से कम 300 दिन करने की घोषणा करें। केन्द्र सरकार से प्रदेशों को मनरेगा के लिए जो पैसा दिया जा रहा है, वह काफी कम है। जो लोग मिट्टी का काम करते हैं और कच्चे कार्य हैं, उनको बहुत कम मजदूरी, ज्यादातर 120 से 140 रुपए, मिलती है और यह उनके लिए पर्याप्त नहीं है। मैं निवेदन करूंगा कि उनको केवल मिट्टी के काम के लिए ही यह मजदूरी न मिले, बल्कि इसमें और काम भी शामिल किया जाए। मैं समझता हूं कि सरकार की यह सोच है कि गरीब मिट्टी में मिलकर उसकी बुद्धि भी मिट्टी जैसी हो जाए, वह विकास न कर पाए और आगे न बढ़ पाए। वह बाहर जाकर 250 रुपए कमाता है, लेकिन गांव में उसको 120 रुपए या 140 रुपए में लगाकर रखा जाता है। वे रुपए भी उसको पूरे नहीं मिलते हैं क्योंकि वे रुपए तो सरपंच के रहमो करम पर मिलते हैं। सरपंच जिसकी हाजिरी भर देता है, उसको पैसा मिल जाता है। उस पैसे का सही उपयोग नहीं हो रहा है। मेरा निवेदन है कि इस पैसे मैं बढ़ोत्तरी हो और मिट्टी के कच्चे काम की जगह उसको पक्का काम मिले। मिट्टी के काम का कुछ पता नहीं चलता है क्योंकि बरसात आई तो वह खत्म हो जाता है। चाहे उसको आधा ही काम मिले, लेकिन पक्का काम मिलना चाहिए क्योंकि, वह टिकाऊ तो होगा। गांव में रहने वाले गरीब लोगों को और सर्व-समाज के लोगों को इसका लाभ तो होगा। मैं आशा करता हूँ कि माननीय मंत्री जी इस ओर भी ध्यान देंगे और 120 से 140 रुपये की मजदूरी को बढ़ाकर 250 से 300 रुपये करने की महती घोषणा भी करेंगे।

मान्यवर, मंत्री जी, हमारे देश में बेरोजगारी एक बहुत बड़ी समस्या है। हमारे देश में लाखों-पढ़े लिखे बेरोजगार युवक हैं। पढ़ने-लिखने के बाद भी उनको नौकरी नहीं मिलती है, जिसके कारण वे परेशान हैं। आज हमारे देश का नौजवान बेरोजगारी के कारण हताश और निराश है। सरकार ने बजट में बेरोजगारों को रोजगार देने के संबंध में कोई उचित प्रावधान नहीं किया है और न ही इस समस्या का कोई समाधान किया है। मैं माननीय मंत्री जी से गुजारिश करूंगा कि वह बेरोजगारी दूर करने हेतु आवश्यक रोजगार सृजन करे जिससे इस समस्या का निदान हो सकेा इसके साथ-साथ मैं आपके संज्ञान में वर्षों से खाली पड़े पदों की ओर दिलाना चाहता हूँ। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ी जाति के ऐसे बैकलॉग पद विभिन्न विभागों में लाखों की संख्या में पड़े हैं जिन्हें आज तक नहीं भरा गया है। माननीय मंत्री जी, यदि सरकार इस बैकलॉग को पूरा करती है, तो पूरे देश में लाखों अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ी जाति के पढ़े-लिखे बेरोजगार युवकों को रोजगार मिल जाएगा, नौकरी मिल जाएगी जिससे कि बेरोजगारी की समस्या का काफी हद तक समाधान होगा। मान्यवर, मैं आपको बताना चाहता हूँ कि हमारी पार्टी की नेता आदरणीय बहन कुमारी मायावती जी जो हमारी पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्षा भी हैं उन्होंने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में उत्तर प्रदेश में विशेष अभियान चलाकर वर्षों से खाली पड़े सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति तथा पिछड़े वर्ग के पढ़े-लिखे बेरोजगारों को लाखों नौकरियां दी। अत: माननीय मंत्री जी केन्द्र के विभिन्न विभागों में पड़े खाली पदों को तुरन्त भरने हेतु आवश्यक कदम उठाएं।

मान्यवर, देश में विद्युत उत्पादन, जिसका लक्ष्य 11वीं पंचवर्षीय योजना में 78,000 मेगावाट रखा गया था, वास्तव में केवल 54,000 मेगावाट हो पाया है। नवीन एवं नवीकरण ऊर्जा के लिए 12वीं पंचवर्षीय योजना में 40 हजार करोड़ रुपए की आवश्यकता बताई गयी थी। बजट में 20 हजार करोड़ रुपये भी नहीं दिया गया है। रेल बंदरगाहों तेल और गैस जेसे अन्य बुनियादी क्षेत्रों का कार्य निष्पादन पूरी तरह से निराशाजनक है। अत: इन क्षेत्रों में विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है जिसे चरणबद्ध तरीके से निवेश बढ़ाया जा सके और आशाजनक तरीके से लक्ष्यपूर्ति हो सके।

मान्यवर, हमारे देश में शिक्षा के क्षेत्र में कुल सार्वजनिक खर्च सकल घरेलू उत्पाद का 3.31 प्रतिात है। जबकि कोठारी कमीशन ने सकल घरेलू उत्पाद का छह प्रतिशत खर्च किए जाने की अनुशंसा की है। इस बजट में शिक्षा पर कुल बजटीय आवंटन सकल घरेलू उत्पाद का 0.69 प्रतिशत किया गया है जो विगत वर्ष के संशोधित अनुमान जीडीपी के 0.66 प्रतिशत की तुलना में मामूली रूप से बेहतर है। शिक्षा के अधिकार (आरटीई) एक्ट के क्रियान्वयन का जिम्मा सरकार के सर्वशिक्षा अभियान (एसएसए) पर है लेकिन इसके लिए बजटीय आवंटन पिछली बार की तुलना में महज 3,613 करोड़ रुपए बढ़ाया गया है। इसमें 2012-13 के 23,645 करोड़ रुपये के बजटीय आवंटन की तुलना में 2013-14 में धनराशि को बढ़ाकर 27,258 करोड़ रुपये किया गया है। निर्धारित अवधि के भीतर आरटीई लक्ष्यों की प्राप्ति के लिहाज से यह नाकाफी है। मान्यवर, इस तरह के अपर्याप्त बजटीय प्रावधानों से सभी बच्चों की पढ़ाई का सपना दूर की कौड़ी ही साबित होगा। नई राष्ट्रीय उच्च शिक्षा स्कीम लांच की गई है लेकिन उसके लिए भी महज 400 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। हालांकि राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के लिए बजटीय प्रावधान पिछले साल के 2,423 करोड़ रुपये की तुलना में इस बार बढ़ाकर 3,124 करोड़ किया गया है। लेकिन यह भी 12वीं पंचवर्षीय योजना में की गई सिफारिशों की तुलना में कम है। फिर भी कमोवेश, माननीय मंत्री जी ने बेहतर शिक्षा के लिए काफी प्रयास किए हैं, किंतु इन्होंने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा आदिवासी क्षेत्र में रहने वाले बच्चों की शिक्षा हेतु बजट में कोई भी चर्चा नहीं की है। इन क्षेत्र में रहने वाले बच्चों की शिक्षा हेतु आई.टी.आई., मेडिकल कॉलेज, निर्सिंग कॉलेज इत्यादि का होना अत्यंत जरूरी है। विशेषकर झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पूर्वी, उत्तर प्रदेश तथा देश के अन्य राज्यों में ऐसे कॉलेज का होना अति आवश्यक है, अत: इन क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों की शिक्षा हेतु बजट में प्रावधान किया जाना अत्यंत जरूरी है। मेरे संज्ञान में आया है कि एससी/एसटी/ओबीसी के छात्रों को दी जाने वाली छात्रवृत्ति समय पर प्रदेशों को निर्गत की जाए जोकि केन्द्र सरकार द्वारा प्रदेशों को अत्यंत विलम्ब के साथ निर्गत की जाती है जिसका खामियाजा इन छात्रों को उठाना पड़ता है। मान्यवर, हमारे देश में दोहरी शिक्षा व्यवस्था प्रणाली है जो अमीरों के लिए अलग व गरीबों के बच्चों के लिए अलग है। मैं आपसे मांग करूंगा कि इस दोहरी शिक्षा व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से खत्म किया जाये जिससे गरीबों के बच्चे को भी समान अवसर प्राप्त हो सके।

मान्यवर, 2012-13 में स्वास्थ्य के क्षेत्र में सार्वजनिक खर्च जीडीपी का महज एक प्रतिशत था वैश्विक दृष्टि से इस मामले में हम निचले पायदान पर खड़े हैं। केवल स्वास्थ्य मदों में भारी खर्चे के कारण हर साल लाखों लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने को विवश होते हैं। लिहाजा स्वास्थ्य सुविधाओं का ढांचा सुधारना सरकार के समक्ष बड़ी नीतिगत चुनौती है। बजट में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए 21,239 करोड़ रुपये आवंटित किए गए है। यद्यपि इस मिशन का दायरा बढ़ाने की रणनीतियों के लिहाज से उम्मीद थी कि इस बार कुल स्वास्थ्य बजट में एनएचएम के हिस्से के आवंटन में बढोतरी होगी लेकिन उसके बजाय इसमें गिरावट दर्ज की गई। हालांकि महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य इंश्योरेंस कार्यक्रम के तहत राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू की गई है। इसमें रिक्शा चालकों, ऑटो और टैक्सी ड्राइवर समेत गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर कर रहे (बीपीएल) श्रेणी के 3.4 करोड़ लोगों को शामिल किया गया है जो कि एक अच्छा कदम है। मैं माननीय मंत्री जी से गुजारिश करूंगा कि स्वास्थ्य सुविधाओं और सेवाओं का दायरा देश के ग्रामीण अंचलों में भी बढ़ाएं जिससे गरीबों विशेषकर एससी/एसटी/ व पिछड़े वर्ग के समुदायों को स्वास्थ्य सेवाओं का समुचित लाभ मिल सके।

मान्यवर, शुद्ध पेयजल हमारी एक बड़ी आवश्यकता है। पेयजल हमारा जीवन है। शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सरकार ने 11वीं पंचवर्षीय योजना तक 1,45,000 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। हालांकि 2011 की जनगणना के मुताबिक 43.5 प्रतिशत लोगों के पास वाटर सप्लाई की सुविधाहै। 11 प्रतिशत लोग कुएं से जल प्राप्त करते हैं। 42 प्रतिशत लोग हैंडपम्प/ट्यूबवेल और 3.5 प्रतिशत लोग अन्य स्रोतों से जल प्राप्त करते हैं। दूसरी तरफ स्वच्छता के मामले में तस्वीर निराशाजनक है। 51.1 घरों में अभी भी शौच की सुविधाएं नहीं है। समाज के पिछड़े वर्गों का हाल तो इस मामले में और भी दयनीय है। इसके बावजूद इस बार ग्रामीण पेयजल और स्वच्छता के मामले में बजटीय आवंटन जीडीपी का महज 0.13 प्रतिशत किया गया है जो पिछले साल 0.14 प्रतिशत था। मेरा मानना है कि मानव विकास के इन बुनियादी पहलुओं पर सरकार ने अपेक्षित आवंटन नहीं किया है। अत: इस तरफ भी ध्यान देने की आवश्यकता है।

मान्यवर, देश की बाहद्यय व आंतरिक सुरक्षा देश के सामने एक बड़ी चुनौती है। चूंकि जिस प्रकार से देश में आतंकवादी घटनायें घटित हुई हैं व देश के कई प्रदेशों में कानून व्यवस्था बिगड़ी है उसे देखकर ऐसा लगता है कि अभी देश की सरकार को दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ सबको साथ लेकर चलते हुए इस चुनौती का सामना करना चाहिए। देश की सरहदों, मैदानी एवं समुद्री रास्तों से आतंकवादियों का आगमन हमारे देश में निरंतर बढ़ रहा है। इसको रोकना बहुत जरूरी है।

जहां आज एक ओर देश के जवानों विशेषकर अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं पर तैनात जवानों पर हमलों से मनोबल गिरा है, वहीं पूर्व सैनिकों को वन रैंक वन पेंशन का लाभ न मिलने से हताशा का माहौल है। मैं आपके माध्यम से सरकार से मांग करता हूँ कि पूरे देश में पूर्व सैनिकों को वन रैंक वन पेंशन की नीति समय-सीमा में बनाकर लागू कराये ताकि करोड़ों पूर्व सैनिकों को इसका लाभ मिल सके।

मान्यवर, अंत में, मैं यह कहना चाहूंगा कि इस बजट में वित्त मंत्री जी ने कई अच्छी और सकारात्मक घोषणाएं की है परंतु कई ऐसी घोषणाएं भी है जिनमें दी गई राहत दिखती है परतु वह वास्तव में समझ से परे हैं। जैसे महज बयालीस हजार आठ सौ अमीरों पर टैक्स बोझ बढ़ाने से गरीबों का कितना भला होगा। गरीबों का भला तब होगा जब उन्हें भूख लगने पर पोषक भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके। रहने के लिए छोटा परंतु स्वच्छ आवास मुहैया हो सके। बीमार होने पर तुरन्त इलाज की सुविधा उपलब्ध हो, स्वच्छ पेयजल, शिक्षा व रोजगार के उचित अवसर प्राप्त हो सकें। इस बजट के माध्यम से गरीबों का अधिकाधिक कल्याण किया जाना हम सभी के लिए बड़ा मुद्दा है और इस ओर हमें भविष्य में आवश्यक कदम उठाने की दरकार है। मैं अपने सुझावों के साथ इस बजट का समर्थन करता हूँ। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपना भाषण समाप्त करता हूँ।

धन्यवाद।

(Ends)
श्री राजपाल सिंह सैनी (UTTAR PRADESH):


माननीय उपाध्यक्ष महोदय,
मैं आपको धन्यवाद देता हूँ कि आपने मुळो बोलने का मौका दिया और धन्यवाद देना चाहता हूँ अपनी नेता और बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष बहिन कुमारी मायावती जी को जिन्होंने मुळो और मेरे अति पिछड़े सैनी समाज को सम्मान दिया और इस सम्मानित सदन का सदस्य बनाकर यहाँ भेजने का कार्य किया। आज तक अन्य किसी पार्टी ने मेरे समाज को यह सम्मान देने का कार्य नहीं किया। आज देश का सैनी शाक्य, कुशवाह, मौर्य समाज टी वी पर यह देखकर खुश हो रहा होगा और धन्यवाद दे रहा होगा बहिन कुमारी मायावती जी को जिन्होंने मुळो यहाँ भेजकर बोलने का अवसर प्रदान कराया। केवल अति पिछड़े सैनी समाज को ही नहीं वरन मेरे साथ में बैठे अति पिछड़े कहार कश्यप समाज में जन्में भाई नरेंद्र कश्यप व अति पिछड़े ही गडरिया पाल बघेल समाज से ताल्लुक रखनेवाले साथी एस पी सिंह बघेल के समाज को भी सम्मान देकर बहिन कुमारी मायावती जी ने इनको भी राज्य सभा में भेजने का कार्य किया।
महोदय, आज भारत में अगर किसी वर्ग की सबसे दयनीय स्थिति है तो वह किसान वर्ग है। ऐसा लगता है कि सरकार किसानों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील नहीं है। महोदय, जब आम बजट पेश किया जाता है तो केवल दिखावे के लिए कृषि और किसान का नाम लिया जाता है जबकि सत्तर प्रतिशत देश की आबादी इस पेशे पर निर्भर करती है। इस आम बजट में भी सरकार कृषि और किसान पर मेहरबान दिखाई नहीं देती। सस्ते कर्जे से लेकर डीजल सब्सिडी और खाद समेत किसान की तमाम उम्मीदों पर पानी फेर दिया। डीजल पर सरकार किसानों के लिए सब्सिडी देती है, लेकिन इस सब्सिडी का पूरा लाभ उद्योगपति व पूंजीपति उठाते हैं। इसलिए सरकार किसानों के लिए ऐसी नीति बनाए जिससे डीजल सब्सिडी का सीधा लाभ किसानों को मिल सके। महोदय, इस बजट से किसानों के हाथ मायूसी ही लगी है। मनरेगा के लिए तैंतीस हजार करोड़ रुपये देने की बात जरूर है पर किसानों की आय बढ़ाने का जरिया इस बजट में नजर नहीं आता। सिंचाई की समस्या को इस बार भी नजरअंदाज किया गया है। देश का करीब 60 प्रतिशत क्षेत्र अभी भी सिंचाई सुविधाओं से वंचित है। इसके बावजूद जब ढाँचागत विकास की बात आती है तो सड़क, हवाईअड्डे और बंदरगाह आगे बढ़ जाते हैं और किसान के लिए सिंचाई परियोजनाएँ मीलों पीछे छूट जाती हैं। इसलिए इस बजट में ऐसा कुछ देखने को नहीं मिलता जिससे कहा जा सके कि कृषि और किसान के लिए कोई बदलाव होने जा रहा है। महोदय, पिछले वर्ष के बजट में कृषि का ऋण पौने छह हजार करोड़ रुपये था और इस वर्ष का बजट पेश करते हुए माननीय मंत्री जी ने कृषि ऋण के लक्ष्य में केवल 125 हजार करोड़ रुपये की बढ़ोतरी की है। लेकिन सीधे तौर पर इसका फायदा किसानों को मिलने के बजाय हमेशा की तरह कोर्पोरेट्स ही ज्यादा फायदे में रहनेवाले हैं। महोदय, किसान को अपनी फसल तैयार करने में जितनी लागत लगानी पड़ती है, उसकी तुलना में फसल का लागत मूल्य भी किसान को नहीं मिलता। महोदय आज तेल कंपनियों को तेल का भाव तय करने की आजादी है। उद्योगपति अपने द्वारा निर्मित सामान का भाव स्वयं तय करता है। दुकानदार अपने माल को अपने भाव पर बेचता है, परंतु दुर्भाग्य की बात है कि जब किसान की उपज का मूल्य सरकार द्वारा तय किया जाता है तो किसानों का कोई भी प्रतिनिधि उसमें शामिल नहीं किया जाता। उसकी फसल का मूल्य वे लोग तय करते हैं जिनको यह भी पता नहीं है कि कितनी बार और कब गन्ने, गेहूँ, धान, सब्जी, दलहन व तिलहन को खाद व पानी दिया जाता है? और कितनी बार किस-किस समय उसकी निराई - गुड़ाई की जाती है। महोदय, मैं किसान का बेटा हूँ, किसान हूँ और स्वयं अपना ट्रैक्टर चलाकर खेत तैयार करता हूँ व खुद उसकी बुवाई करता हूँ। मैं किसान की समस्या व दर्द को भलीभाँती समळाता हूँ। इसलिए मेरी सरकार से पुरजोर अपील है कि किसान की उपज का मूल्य तय करते समय उसका प्रतिनिधि भी शामिल रखा जाए।
महोदय, कृषि अनुसंधान के लिए 3415 करोड़ रुपए की राशि रखी गयी है और वहीं कुछ नए कृषि अनुसंधान खोलने की बात भी कही गयी है। इससे सरकार किसान के हित के लिए बात करती है। परंतु महोदय, इससे आम किसान को कोई फायदा नहीं मिल रहा है क्योंकि वह तो अपनी पारंपरिक खेती करता है। स्वयं बीज पैदा करता है, क्योंकि उसको उन्नत बीज व खाद समय पर नहीं मिल पाता। महोदय, मैं पहले भी कह चुका हूँ कि किसान को उसकी उपज का सही व समय पर भुगतान नहीं मिलता, जिससे किसान की रुचि कृषि से हट रही है। यदि किसान को समय पर भुगतान नहीं होगा तो महोदय वह कर्ज की अदायगी कैसे कर पाएगा? ऊपर से किसान मौसम की मार का भी शिकार होता है। कभी बाढ़, कभी ओलावृष्टि कभी सूखा किसान को तबाह कर देता है, इसलिए यदि किसान की हालत में सुधार के लिए नहीं सोचा गया तो किसान खेती करनी छोड़ देगा। इसका क्या परिणाम होगा, इससे सभी भलिभाँति परिचित हैं। आज जंतर-मंतर पर किसान अपनी मांगों के लिए धरना दिए बैठे हैं, वे अपनी उपज का उचित मूल्य दिए जाने की मांग कर रहे हैं। सरकार उनकी मांगों की ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है। आप खाद्य सुरक्षा बिल की बात कर रहे हैं, परंतु किसान के बारे में कुछ नहीं सोच रहे हैं। इससे परेशान होकर यदि किसान का कृषि से मोह भंग हो गया और उसने पैदावार करनी छोड़ दी तो इस खाद्य सुरक्षा बिल का क्या होगा? खाद्यान्न की आपूर्त्ति कहाँ से होगी? आज कोई भी किसान अपने बेटे को कृषि के कार्य में नहीं लगाना चाहता क्योंकि वह जानता है कि यह फायदे का कार्य नहीं है।
महोदय, मैंे आर्गनिक कृषि की बात भी करना चाहूँगा। आर्गनिक फसल की पैदावार बढ़े इस ओर भी सरकार को अधिक ध्यान देना होगा। इसमें किसान की रुचि बढ़ाने के लिए सरकार को कुछ कदम उठाने होंगे। क्योंकि इसकी पैदावार के लिए किसान को बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन उपज कम निकलती है। इसलिए सरकार को इसका मूल्य सामान्य उपज से कम-से-कम पाँच गुना अधिक रखना होगा। आर्गनिक उपज की भी मिनिमम सपोर्ट प्राइज तय करनी होगी तथा किसान की इस उपज को सरकार को खरीदने की गारंटी देनी होगी तभी किसान आर्गनिक कृषि की ओर बढ़ेगा।
महोदय, पशु धन के लिए सरकार ने इस बजट में केवल 360 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है, जो कि बहुत कम है। इस पर भी सरकार को सोचना होगा।

मान्यवर, भारत की 70 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। लेकिन आबंटन कुल बजट का 3.6% है। इससे पता चलता है कि सरकार 70 प्रतिशत आबादी के बारे में क्या सोच रखती है।
महोदय, दूरदर्शन पर दुनिया भर के चैनल केवल मनोरंजन के लिए चल रहे हैं, लेकिन इस आधुनिक युग में किसानों के लिए आज भी कृषि कार्यक्रमों को प्रसारित करने के लिए कोई टीवी चैनल उपलब्ध नहीं है। अत: मेरी सरकार से मांग है कि किसानों को समय-समय पर उनकी भाषा में कृषि से संबंधित नवीनतम जानकारी और कृषि साहित्य उन तक पहुँचाने के लिए टीवी चैनल चलाया जाए। इससे किसान लाभ उठा सकेंगे।
महोदय, मैं पश्चिम उत्तर प्रदेश के जनपद मुजफ्फरनगर से आता हूँ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक गन्ने की पैदावार होती है। मुजफ्फरनगर में एक समय एशिया की सबसे बड़ी गुड़ मंडी हुआ करती थी और आज वह समाप्ति के कगार पर है। जिससे इससे जुड़े किसान-कामगार और आढ़ती भारी नुकसान उठा रहे हैं। इसलिए सरकार मंडियों के लिए ऐसी नीति बनाए जिससे मृत प्राय: रोजगार में जान पड़ सके तथा इससे जुड़े किसान-कामगार और आढ़ती को दोबारा लाभ मिल सके। महोदय, अपनी बात समाप्त करने से पहले मैं माँग करता हूँ और यह किसानों की भी शुरू से ही मांग रही है कि जिस प्रकार रिक्शा चालक, आटो ड्राइवर व कबाड़ी को स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत लाया गया है किसानों को भी इस योजना के अंतर्गत लाया जाए। धन्यवाद

(Ends)




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