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MR. DEPUTY CHAIRMAN: Please conclude now.

SHRI D. RAJA: Sir, there are several legislations such as the Whistleblowers Bill, the Right of Citizens for Time Bound Delivery of Goods and Services and Redressal of their Grievances Bill, 2011, which must be taken up without any delay. How long can you delay it? This is what the Law Ministry have to address.

Finally, I should talk about Judiciary.



MR. DEPUTY CHAIRMAN: You are taking a lot of time.

SHRI D. RAJA: Sir, there is only one point about Judiciary. There is a wide perception that Judiciary is very much * It is spilling danger to the justice delivery institution. I would like to quote ...(Interruptions)...

MR. DEPUTY CHAIRMAN: No; listen to me. I am not allowing that statement. You can say that there may be corrupt judges. You do not say that the whole judiciary is corrupt.
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*Not recorded.


SHRI D. RAJA: I am not saying that.

MR. DEPUTY CHAIRMAN: You said that.

SHRI D. RAJA: I am not saying that. There is corruption ...(Interruptions)...

MR. DEPUTY CHAIRMAN: No; you said that. I am telling you that even today, I have to say it, even today the ultimate hope of the citizens is Judiciary. I am telling you. ...(Interruptions)... There are corrupt judges. That I agree.

SHRI D. RAJA: Okay; I amend this statement. There are problems of corruption. So, it affects justice delivery institutions. Sir, I would like to quote Shri K.R. Narayanan, the former President of India. He was Vice-President also. He occupied that Chair also. While inaugurating the Golden Jubilee Celebrations of Supreme Court, he quoted British Editor Mr. Richard Ingrams, who wrote an article entitled ‘Rich man’s law’. In that article, he observed that the law courts are no more considered as cathedrals but as casinos where things are decided on the throw of dice. We need to address this challenge by reforming the Judiciary. Here comes the question of giving representation to socially oppressed classes – Scheduled Castes and Scheduled Tribes – in Judiciary. ...(Interruptions)... You can call it reservation. Social representation of the oppressed classes ...(Interruptions)...

MR. DEPUTY CHAIRMAN: Okay. That is over. Now, Shri Rajeev Shukla. ...(Interruptions)... No, please. You have taken everybody’s time.

SHRI D. RAJA: Otherwise, there is bound to be a severe crisis in our system of governance. I am talking in terms of good governance. If we have to ensure good governance, we must do this. Thank you, Sir. (Ends)

MR. DEPUTY CHAIRMAN: Mr. Raja is Raja. He is not listening to me. What can I do? Now, Shri Rajeev Shukla.

श्री राजीव शुक्ल (महाराष्ट्र) : माननीय उपसभापति जी, धन्यवाद, लॉ एंड जस्टिस मिनिस्ट्री पर हमारे सदन में जो बहस हो रही है, मैं इस पर बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं।

सर, ज्यूडिशियरी को लेकर हमारे पहले के वक्ताओं ने तमाम तरह की बातें रखी हैं। सभी लोग इस बात को मानते हैं कि जो न्याय है, वह धर्म की तरह है और इसको उतना ही महत्व दिया जाता है, लेकिन मैं यह देख रहा हूं कि बजट के जो प्रावधान आए हैं, उनमें लॉ एंड जस्टिस मिनिस्ट्री के लिए जो प्रावधान होने चाहिए, जो रोडमैप होना चाहिए, वह बिल्कुल कहीं भी दिखाई नहीं देता है।

(4g/psv पर जारी)

-SCH/PSV-YSR/4G/6.25

श्री राजीव शुक्ल (क्रमागत): न कोई इस तरह का धन सैंक्शन किया गया, आवंटित किया गया कि कोई बहुत बड़ा reform judiciary में हो पाए, infrastructure के लिए इतना पैसा दिया गया कि judiciary में कुछ हो पाए और न ही ऐसी योजनाएँ पेश की गईं कि आप देश की न्याय व्यवस्था को सुधार सकें। जहाँ तक इस मंत्रालय का ताल्लुक है, तो बजट के मामले में बहुत निराशा है और मुझे लगता है कि मंत्री जी भी इस बात से सहमत होंगे। जहाँ तक राज्यों को पैसा देने की बात है, तो ...(व्यवधान)...

श्री विशम्भर प्रसाद निषाद: सर, ...(व्यवधान)...

MR. DEPUTY CHAIRMAN: What is your problem?

श्री विशम्भर प्रसाद निषाद: सर, मुझे अपना स्पेशल मेंशन ले करना है।

श्री उपसभापति: आप डिस्कशन के बाद उसे ले कर लीजिए।

श्री राजीव शुक्ल: ऐसा भाषण के बीच में नहीं होता।

श्री उपसभापति: मैं आपको टाइम दूँगा।

श्री राजीव शुक्ल: भाषण के बीच में ले नहीं किया जाता है। ...(व्यवधान)...

DR. K. KESHAVA RAO: Since he is leaving, he wants your permission to allow other Member to lay it on his behalf.

श्री उपसभापति: यह अभी ले नहीं हो सकता। यह डिस्कशन के बाद हो पायेगा।

श्री राजीव शुक्ल: सर, राज्यों के लिए भी कोई प्रावधान नहीं है कि उनको कम से कम इस मंत्रालय के लिए कोई पैसा दिया गया हो। हमारे यहाँ तो आम आदमी यह कहता है, वह भगवान से एक ही प्रार्थना करता है कि उसे न तो अस्पताल जाना पड़े और न ही अदालत में जाना पड़े। लोग यही मनाते हैं कि कोर्ट-कचहरी न जाना पड़े, क्योंकि जो एक बार इसके चक्कर में फँसा, तो उसके लिए बड़ी मुसीबत हो जाती है और वह उसी में जिंदगी भर लड़ता-सड़ता रहता है। सर, आपको भी एक केस का पता होगा। एक पोस्टमैन था, जिसका नाम उमाकांत था। यह किस्सा दो साल पहले अखबार में आया था। वह सस्पेंड हो गया। उस पर 29 साल केस चला। 29 साल के बाद वह बरी हुआ, क्योंकि उसके ऊपर कोई आरोप साबित नहीं हुआ। इस तरह, वह 29 साल तक सस्पेंड रहा और 29 साल बाद तनख्वाह के 57 रुपये मुआवजे के रूप में उसे मिले, लेकिन तब तक वह बूढ़ा हो चुका था। यह तो इस देश में ज्यूडिशियरी का हाल है, तो आप कैसे इसको सुधार सकते हैं? मैं इसके लिए किसी एक सरकार को ब्लेम नहीं करता हूँ। यह लगातार चलता आ रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने खुद लिखा था कि the wheel of justice in India has come to a standstill. Only God can save it. तो सोचिए कि क्या हाल है। मैंने पिछले दिनों एक सवाल लगाया था, जिसके जवाब में मंत्री जी ने खुद बताया है कि जो केसेज़ की पेंडेंसी है, उसमें 61,300 केसेज़ सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग हैं, 41.53 लाख केसेज़ हाई कोर्ट्स में पेंडिंग हैं और 2 करोड़ 64 लाख केसेज़ district and lower courts में पेंडिंग हैं। तो सोचिए कि यहाँ क्या हाल है। जो fast track लगाया गया था, तो fast track काफी successful हुआ, लेकिन मेरा मानना है कि ज्यादातर केसेज़ मजिस्ट्रेट्स के पास हैं। तो जो magisterial system है, उसके अन्दर भी fast track courts हमें लगाने चाहिए, तभी इसका हमें advantage मिल सकता है। Law commission की एक recommendation है कि there should be 50 judges per million population. So far, we have got 11 judges per million population. That number should also be increased. लेकिन, वह बढ़ाने की बात आप छोड़ दीजिए, इस समय 251 vacancies High Courts में हैं और 3 सुप्रीम कोर्ट में हैं। अभी जो हाल चल रहा है, उसमें यह है कि National Judicial Appointments Commission बनाया गया, इसमें सब कुछ हो गया, लेकिन अभी तक वह constitute ही नहीं हो पा रहा है। जब पिछली सरकार थी, तो उसने वह बिल राज्य सभा में पास कराया था, लेकिन उस समय हमारे सत्तारूढ़ दल ने उसका विरोध किया था और उसके बाद वह बिल लोक सभा में पास नहीं हो पाया, तो वह चीज़ लटक गयी। अभी तक ये चीफ जस्टिस को नहीं समझा पाये हैं कि कम से कम वे आकर इसमें बैठें और दो eminent persons को nominate करें, जिससे National Judicial Appointments Commission constitute हो सके। उस मामले में बहुत तेज़ी बरतनी चाहिए।

सर, राम गोपाल जी ने जजेज़ के बारे में बात उठाई, पेंडेंसी के बारे में भी बात उठाई और तमाम बातें उन्होंने रखीं। यह बात तो है ही, लेकिन सबसे बड़ी चीज़ quality of judges है। हम कैसे जज ला रहे हैं, यह बड़ी जरूरी बात है। क्या आपको पता है, नीचे के कोर्ट्स को तो छोड़ दीजिए, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स में तमाम जजेज़ ऐसे हैं who have got ghost writers. They cannot write judgements properly. They have hired people who are writing judgements for them. Certain judges have got ghostwriters. It is a very serious thing. What kind of people are you bringing in the Supreme Court and the Higher Courts? They cannot write judgements properly. Everybody knows about it. Most of the lawyers know that they have got ghostwriters. But you cannot help it because they have come after a certain process. But they have come without having that kind of competence. यह एक बड़ी प्रॉब्लम है, तो quality of judges के मामले में ध्यान रखना चाहिए। श्री डी. राजा ने अम्बेडकर साहब को क्वोट किया। अम्बेडकर साहब ने खुद कहा है और राज्य सभा टीवी में जो फिल्म दिखायी गयी, उसमें भी यह है कि जजेज़ भगवान के बराबर हैं। मुझे कई बार लगता है कि क्या ये इतने competent हैं कि ये भगवान की तरह फैसले कर सकें? मुझे तो इसी पर शक होता है। हम उनको सारी powers देने तो जा रहे हैं, लेकिन he was not in favour of giving absolute powers to judges. He was against giving absolute powers to the judiciary. But what have we done? We have given absolute powers to them. Or they have usurped absolute powers over a period of time.

(Contd. by KR/4H)



-PSV/VNK-KR/4H/6.30

SHRI RAJEEV SHUKLA (CONTD): So, this is the weakness of the Executive and successive political leadership. I am not blaming one Government or the other Government. But successive political leadership has failed on that count.

सर, तीसरी चीज यह है कि most of the Judges are living in ivory towers. आज कल जजों में एक फैशन बन गया है कि किसी से बिल्कुल बात न करो, किसी से न मिलो, तभी आप ऑनेस्ट कहलाओगे। अगर आप किसी से मिले, किसी से बात की, तो आपको बड़ा खराब जज माना जाता है। उससे यह होता है, since they live in ivory towers they are not exposed to changes in the world. उनको पता ही नहीं है कि देश-दुनिया में क्या हो रहा है, कितना चेंज हो रहा है, क्या हो रहा है। जब उनके पास केसेज़ आते हैं, हजारों करोड़ के, लाखों करोड़ के, बिलियन्स ऑफ डॉलर्स के केसेज़ आते हैं, so they are not able to figure out कि करना क्या चाहिए। इस स्थिति में वे क्या करते हैं? एक जज ने खुद मुझसे कहा कि साहब, हमारी तो समझ में ही नहीं आता है, हम तो घबरा जाते हैं कि यह हजारों करोड़ के केस, सैकड़ों करोड़ के केस! यह बात सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने कही। ऐसी स्थिति में हम यह करते हैं कि जो वकील आते हैं, उनको तारीख पर तारीख देते हैं और उनसे समझने की कोशिश करते हैं कि यह मामला क्या है। यह इसी कारण से है कि जजेज़ का एक्सपोजर बहुत कम है, क्योंकि उनको यह समझाया गया कि आप बिल्कुल किसी से मत मिलिए, घर के अंदर बंद रहिए, घर से सुप्रीम कोर्ट जाइए, घर से हाई कोर्ट जाइए और वापस आ जाइए। ऐसे में आप worldly-wise हो ही नहीं पाते हैं, समझ ही नहीं पाते हैं और इसका नतीजा यह होता है कि केसेज़ में सही जजमेंट नहीं आ पाते हैं। यह बहुत जरूरी चीज है, जिसको हमें देखना चाहिए कि हम किस तरह के जजेज़ ला रहे हैं। Competent Judges आने चाहिए।

सर, corruption in judiciary की बात उठाई गई, इस संबंध में मेरा यह मानना है कि खुद चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया, दो चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने कहा कि हमें इस बात की बड़ी चिंता है कि जुडिशियरी के अंदर भ्रष्टाचार आ रहा है और उन्होंने इस मामले में सख्त कदम उठाने की बात कही। यह बात सही है, मैं इस बात के लिए सुप्रीम कोर्ट को धन्यवाद दूंगा कि कभी भी किसी जज की कंम्प्लेंट होती है, they take the cognizance. Immediate action is taken, and inquiries are instituted. वह इस मामले में prompt हैं, लेकिन लोअर जुडिशियरी में तो there is corruption in abundance. लोअर जुडिशियरी में तो ओपनली पेशकार तारीख बढ़ाने का पैसा लेता है, सामने इकट्ठा होता है, लेकिन कोई स्टिंग ऑपरेशन भी नहीं करता है। हायर जुडिशियरी में यह जो शुरू हुआ है, यह बहुत खतरनाक बात है और इसके लिए मैं हायर जुडिशियरी के जो लॉर्ड्स हैं, उनसे ही रिक्वेस्ट करूंगा कि उन्हें ही यह देखना चाहिए, इसको रोकने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि अगर हायर जुडिशियरी में करप्शन ज्यादा बढ़ गया ---- बहुत अच्छे जज हैं, मैं समझता हूँ कि 70 परसेंट जजेज़ ऑनेस्ट हैं, लेकिन उन 30 परसेंट की वजह से अगर हायर जुडिशियरी में करप्शन बढ़ गया, तो लोगों का जुडिशियरी पर faith खत्म हो जाएगा। इस शिकायत को इनको किसी तरह से कंट्रोल करना चाहिए।

सर, जहां तक अंडर ट्रायल्स का मामला है, मुझे लगता है िक इसको कुछ लोगों ने उठाया होगा, लेकिन मुझे पता नहीं है। अंडर ट्रायल्स लाखों की तादाद में जेलों में पड़े हैं, सड़ रहे हैं, उनकी जमानतें नहीं हो पाती हैं। वे अफोर्ड नहीं कर पाते हैं। सबसे ज्यादा अंडर ट्रायल्स दहेज के मामले में हैं। 80-80 साल की बूढ़ी महिलाएं जेलों में पड़ी हैं, बेचारों की जमानत नहीं हो पा रही हैं। इसमें दिक्कत यह है कि इसमें गवाह नहीं मिलते हैं, इसलिए इसके लिए कुछ रास्ता निकालना चाहिए ताकि अंडर ट्रायल्स का कुछ हो।

सर, जजेज़ की accountability भी फिक्स होनी चाहिए। जजेज़ की कोई accountability नहीं है। यह बात राम गोपाल जी ने भी कहा है, सुखेन्दु शेखर राय जी ने भी कहा है तथा और कई लोगों ने भी कहा कि वे कुछ भी कर दें, उसमें कुछ नहीं है। चाहे वे अपने लिए मकान ले लें, कार ले लें, चलिए वह तो ठीक है, सुविधाओं की कोई बात नहीं है, लेकिन उनकी भी कोई accountability फिक्स होनी चाहिए। जब इस देश में राष्ट्रपति से लेकर चपरासी तक की जवाबदेही है, तो जजेज़ की जवाबदेही क्यों नहीं है? दुनिया भर में हर एक के लिए कहते हैं कि आरटीआई लगाइए। जिसको देखिए, उसी को ऑर्डर कर देते हैं कि आरटीआई लगाओ, यह पीआईएल के दायरे में आता है, इसके खिलाफ अपील हो सकती है। इनके खिलाफ क्यों नहीं आरटीआई लगती है? ये अपने खिलाफ आरटीआई की इजाजत क्यों नहीं देते? अगर सबको आरटीआई के तहत ला रहे हैं, तो इनको भी आरटीआई के तहत लाना चाहिए। अगर किसी भी politician का फंस जाए, तो समझ लीजिए कि वह रगड़ा गया, वह नहीं बचनेवाला। डेमोक्रेसी में सबके लिए बराबर होना चाहिए, किसी के लिए कोई छूट नहीं होनी चाहिए, या तो फिर यह होना चाहिए कि जो सुविधाएं उनको मिली हुई हैं, सबको वह सुविधा मिलनी चाहिए।

सर, इसके बाद महंगे न्याय की बात आती है। यहां वकील बहुत हैं, हमारे रवि शंकर प्रसाद भी बैठे हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक जज से मैंने पूछा कि रिटायरमेंट होने के बाद अगर आपका, भगवान न करे, कोई केस फंस जाए, तो क्या आप सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा लड़ पाएंगे? उसने कहा कि हम नहीं लड़ सकते हैं। हमारे पास इतना पैसा ही नहीं है कि हम मुकदमा लड़ सकें। सुप्रीम कोर्ट में आम आदमी तो छोड़ दीजिए, मिडल क्लास भी छोड़ दीजिए, अपर मिडल क्लास का आदमी भी मुकदमा नहीं लड़ सकता है। इतने महंगे वकील हैं। होता यह है कि 14-15 नामी-गिरामी वकील हैं, इन्हीं के पास लोग दौड़ते हैं, क्योंकि अगर वे जज के सामने खड़े होंगे, तो फिर वह फैसला हक में मिल जाएगा और वे इतना पैसा लेते हैं कि आप उसके बारे में सोच भी नहीं सकते हैं। इस संबंध में मेरी सलाह यह है कि इसका एक ही तरीका है कि जज शक्ल देख कर न जाएं, कितना बड़ा नाम है, यह देख कर जजमेंट न दें। जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उस दिन इस समस्या का हल हो जाएगा।



(4j/DS पर जारी)

-VNK/DS-KS/6.35/4J

श्री राजीव शुक्ल (क्रमागत): वे जहाँ देखते हैं कि अच्छा, ये फलां जी हैं, ये फॉर्मर मिनिस्टर हैं, ये फलां रह चुके हैं, ये वो रह चुके हैं, तो फिर they get carried away. They should not get carried away. They should go by the merit of the case and by the arguments made by honourable counsels. यह गड़बड़ वहाँ पर हो जाती है और इस वजह से ये उसका पूरा फायदा उठाते हैं। इनकी फीस बढ़ती चली जाती है, करोड़ों में पहुँच जाती है। सर, अभी रुक जाइए, मेरा थोड़ा ही है। यह बड़ी मुश्किल है, इसलिए affordable justice का कोई प्रोविजन होना चाहिए। इसके लिए कुछ न कुछ करना चाहिए, इस पर कुछ न कुछ कैप लगनी चाहिए कि कौन कितना ले सकता है और अच्छे वकील को एन्करेज़ करना चाहिए, भले ही वह यंग हो, जूनियर हो, लेकिन अच्छा काम करता हो। इसलिए जजेज़ को अपना ऐटिट्यूड बदलना चाहिए।

THE MINISTER OF COMMUNICATIONS AND INFORMATION TECHNOLOGY (SHRI RAVI SHANKAR PRASAD): Sir, I have to interrupt here. Sir, this is a sweeping remark, that the judges give relief only depending upon the face of the lawyers.

SHRI RAJEEV SHUKLA: I am not talking about all the judges.

SHRI RAVI SHANKAR PRASAD: But this is a sweeping comment.

MR. DEPUTY CHAIRMAN: No, no. That will be removed. That should not be.

SHRI RAJEEV SHUKLA: I am not talking about all the judges. I am talking about certain courts.

MR. DEPUTY CHAIRMAN: Rajeev Shuklaji, I have already said that there may be some corrupt judges, but don't make sweeping comments. And Judiciary, I repeat, is the last resort for the litigant.

SHRI RAJEEV SHUKLA: Sir, I have said, seventy per cent of judges are honest. This is what I have said. Where have I said that judges, the Judiciary, are corrupt? No, never. Seventy per cent of the judges are honest. ...(Interruptions)...

SHRI D. RAJA: How can the Parliament say that there can be corrupt judges?

श्री तरुण विजय: यह 30 परसेंट का आँकड़ा कहाँ से आया? ...(व्यवधान)...

श्री राजीव शुक्ल: वह by and large है। ...(व्यवधान)...

MR. DEPUTY CHAIRMAN: You see, there may be corrupt judges. But you cannot make sweeping remarks. A majority of the judges are not corrupt. No doubt about it.

SHRI RAJEEV SHUKLA: Sir, I have not made sweeping remarks.

SHRI TIRUCHI SIVA: A majority of the judges are honest.

SHRI RAVI SHANKAR PRASAD: You also said that in the Supreme Court, only when eminent lawyers with a proper face appear, they give relief.

SHRI RAJEEV SHUKLA: Mr. Ravi Shankar Prasad, in certain courts, it happens.

PROF. RAM GOPAL YADAV: Whatever he has said is the perception of the majority of the population of the country. I agree with him totally.

SHRI RAJEEV SHUKLA: Actually, he is the beneficiary.

श्री रवि शंकर प्रसाद: वैसे राम गोपाल जी, उनकी पार्टी के कई मित्रों ने वकालत शुरू कर दी है। ...(व्यवधान)...

SHRI RAJEEV SHUKLA: Actually, he is also the beneficiary.

MR. DEPUTY CHAIRMAN: Ravi Shankarji, you did not hear his insinuation. He said you are the beneficiary. Yet, you have not reacted.

SHRI RAVI SHANKAR PRASAD: I completely deny that except to remind him that many of his eminent colleagues who have been former Ministers are there in the Supreme Court now. That is what I am saying.

SHRI RAJEEV SHUKLA: I am talking about them also. ...(Interruptions)... I am talking about them as well. They are also responsible.

सर, तीसरी चीज़, जो आजकल शुरू हुई है, वह है, media-driven judgments. पता है कि यह केस ऐसा है, इसमें अन्याय हो रहा है, लेकिन मीडिया ने अगर स्टैंड ले लिया, तो certain courts and certain judges get carried away and, then, go by what the media says. ये चीज़ भी रोकनी पड़ेगी, क्योंकि क़ानून अंधा होता है, उसको टेलीविजन दिखाई नहीं देता और न उसे देखना चाहिए। यह एक बड़ी चीज़ है।

इसके अलावा, जैसा हमने पहले भी कहा था कि जैसे आईएएस होता है, उसी तरह Indian Judicial Service introduce करनी चाहिए, जिसमें उनकी प्रॉपर ट्रेनिंग हो और वहाँ से IJS बनाकर भी जजेज़ को लाना चाहिए, सिर्फ वकीलों में से ही ये नहीं आने चाहिए। इसी प्रकार, इनकी छुट्टियाँ कम करनी चाहिए। जैसे स्कूलों में छुट्टियाँ होती हैं, उस तरह से ज्यूडिशियरी में भी छुट्टियाँ होती हैं। जैसे स्कूलों में बच्चों की गरमी की छुट्टी डेढ़ महीने के लिए हो जाती है, वैसे ही जजों की भी छुट्टी हो जाती है। ...(व्यवधान)... हाँ, उससे भी ज्यादा। इसलिए ये छुट्टियाँ बंद करनी चाहिए, कम करनी चाहिए। अगर आप छुट्टियाँ देते हैं, तो फिर ऐसा न हो कि Judge on Vacation एक बेंच हो, बल्कि there should be at least ten Benches during the vacations. यह प्रावधान लोअर कोर्ट्स तक करना चाहिए, क्योंकि उस समय लोगों को न्याय नहीं मिलता। डेढ़ महीने की छुट्टी हो गई, अब चलो मसूरी, चलो शिमला, चलो दार्जिलिंग। इसलिए ये छुट्टियाँ कम करनी चाहिए।

सर, मेरा एक और सुझाव है। जो भी प्राइम मिनिस्टर होते हैं, उनका यह prerogative होता है, लेकिन मैं इसे मजाक में कह रहा हूँ कि कभी-कभी यह एक्सपेरिमेंट भी करना चाहिए कि जो वकील न हो, उसको लॉ मिनिस्टर बनाना चाहिए। क्योंकि जब प्रॉमिनेंट वकील लॉ मिनिस्टर बना दिए जाते हैं, तो वे इसलिए डरा करते हैं कि अगर कल को मैं मिनिस्टर न रहा तो इसी जज के सामने मुझे केस लड़ने जाना पड़ेगा। So, they always try to woo the judges. Their approach is always soft towards the Judiciary.




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